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मासिक पत्रिका जुलाई-अगस्त,2021 पी.डी.एफ. डाउनलोड

समुद्र मंथन और इससे निकले रत्नों की कथा से भला कौन भारतीय अपरिचित है। इन्हीं रत्नों में से एक है घोड़ा उच्चै:श्रवा‚ जो देवताओं के राजा इंद्र को प्राप्त हुआ। एक अन्य पौराणिक संस्करण के अनुसार‚ इस घोड़े को दैत्य राज बलि ने हासिल किया था। उच्चै:श्रवा ग्रीक मिथकीय पंखों वाले पेगासस घोड़े के सदृश ही है बस एक अंतर यह है कि उच्चै:श्रवा के सात सिर हैं।

इस्राइली जासूसी सॉफ्टवेयर भले ही ग्रीक मिथकीय अश्व पेगासस के नाम पर हो लेकिन इसके उपयोगकर्ता को यह उच्चै:श्रवा की भांति 7 सिरों वाले अति मानवीय या मायावी शक्तियों से युक्त करता है। इस सॉफ्टवेयर का स्वामी अपनी मानवी या दानवी वृत्तियों के अनुरूप ही इसका उपयोग सुनिश्चित करता है। यह मैं पाठकों पर छोड़ता हूं कि भारत में यदि इसका उपयोग हो रहा है‚ तो कैसा उपयोग हो रहा है? हां‚ एक बात और यह कि उच्चै:श्रवा की एक विशेषता इसका ऊंचा सुनना या न सुनना है। पेगासस संबंधी आरोपों पर जांच के लिए हमारी सरकार शायद उच्चै:श्रवा के अनुरूप ही व्यवहार कर रही है। दरअसल पेगासस का पूरा मामला किसी की निजता के हनन से जुड़ा हुआ है।

पूर्व में 25 फरवरी‚ 2021 को जब केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया दिशा-निर्देशों को लागू किया था और कहा था कि 50 लाख से अधिक उपभोक्ता वाले सोशल मीडिया मध्यस्थों को किसी भी चैट या संदेश की उत्पत्ति की पहचान सुनिश्चित करना होगा‚ तब इसे निजता वादियों ने निजता के अधिकार को कमजोर करने वाला माना था। संदेशों की उत्पत्ति का पता लगाने वाले प्रावधान के बारे में सरकार ने कहा है ‘‘यह जनहित में है कि किसी तरह के अपराध को अंजाम देने वाली शरारत की शुरुआत किसने की‚ उसका पता लगाया जाए और उसे दंडित किया जाए।’’

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पेगासस सॉफ्टवेयर की तरह सोशल मीडिया के नए दिशा-निर्देश भी अपराधियों‚ राष्ट्रविरोधी तत्वों या अपमानजनक भाषा के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जा सकता है या फिर अपने ही नागरिकों की निजता के हनन हेतु‚ यह निर्भर करता है उपयोगकर्ता की नीति और नियत पर। इस अंक के आवरण आलेख में नए डिजिटल मीडिया दिशा-निर्देशों के साथ-साथ पेगासस जासूसी प्रकरण पर भी प्रकाश डाला गया है।

युद्ध-विजय के पश्चात 19वीं सदी में निर्मित ब्रिटिश बर्मा 100 से अधिक भिन्न-भिन्न नृजातीय समूहों का देश था। 1948 में स्वतंत्रता के पश्चात इनमें से अधिकांश समूहों ने नवगठित सरकार के विरुद्ध संघर्ष शुरू कर दिया। उस समय की बर्मी सेना में (कमोबेश आज भी) बामर जातीय समूह का प्रभुत्व था। इस जातीय समूह ने अलगाव के विरुद्ध संघर्ष के नाम पर अन्य नृजातीय समूहों का दमन प्रारंभ कर दिया। 1962 में सेना ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार को सत्ताच्युत कर दिया और लगभग 50 वर्षों तक निर्बाध शासन किया/सेना‚ जिसे ‘टाटमादाव’ कहते हैं‚ ने अपने शासन को इस आधार पर औचित्यपूर्ण बताया कि केवल वही पूरे देश को एक रख सकती है। 1988 में सेना ने लोकतांत्रिक आंदोलन का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया। 2011 में टाटमादाव (सेना) ने नागरिक सरकार के गठन के मार्ग प्रशस्त करने की बात कर पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया था। दरअसल इसके कारणों में‚ म्यांमार की रसातल में जा रही अर्थव्यवस्था और दशकों से पश्चिमी देशों द्वारा राजनयिक पृथक्करण के कारण म्यांमार पर चीन ने अपना शिकंजा कस दिया जाना शामिल था। 1962 में जो बर्मा एशिया के सबसे धनी देशों में से एक था‚ 50 वर्षों बाद वही म्यांमार (परिवर्तित नाम) महाद्वीप के सबसे गरीब देशों में शुमार था। सेना द्वारा लोकतंत्र के प्रशस्तीकरण में रुचि का एक कारण उसका यह विश्वास भी था कि बावजूद नागरिक सरकार के सेना का ही सत्ता-शासन पर वर्चस्व रहेगा‚ क्योंकि संविधान में संशोधन कर उसने इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया था। नए संविधान के तहत 2010 के चुनावों का आंग सान सू की के नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने बहिष्कार किया। इन चुनावों में थीन-सीन की सरकार का गठन हुआ‚ जो सेना की ही मुखौटा सरकार थी। 2011 से आंग सान सू की ने लोकतंत्र की स्थापना-प्रक्रिया में भाग लेना प्रारंभ किया और 2015 के चुनावों में उनकी पार्टी को एकतरफा विजय हासिल हुई। सेना के नियंत्रण और विभिन्न नृजातीय समूहों के दबाव के कारण आंग सान सू की का शासन बहुत प्रभावी न रहा। उनकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति भी वैसी न रही जो पूर्व में थी। 2017 के रोहिंग्या विद्रोह‚ जिसमें सेना ने लगभग 10000 रोहिंग्याओं को मार दिया और लगभग 72000 से ज्यादा पलायन को विवश हुए‚ में सू की ने सीमा का समर्थन किया। परिणामस्वरूप बहुसंख्यक बामर जाति का उन्हें समर्थन हासिल हुआ और 2020 के चुनावों में र्‍थ्अ् को प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ। सत्ता हथियाने का और कोई रास्ता न देख सेना ने एक बार फिर 1 फरवरी‚ 2021 को चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई आंग सान सू की‚ की सरकार का तख्तापलट दिया। इस प्रकार म्यांमार लोकतंत्र-सेना‚ लोकतंत्र-सेना के शासन चक्र के बीच घूमता रहा है। खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से यहां खतरनाक स्तर तक चीन के मंसूबों को सफल होने की परिस्थितियां उत्पन्न कर दी है। अत: भारत के लिए भी म्यांमार चिंतनीय सरोकार का विषय है। इस अंक में म्यांमार की तख्तापलट का दक्षिण एशिया की राजनीति पर प्रभाव का विश्लेषण सामयिक आलेख के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है।

उत्तराखंड के चमोली जिले में एक हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने‚ तत्पश्चात भू-स्खलन एवं बाढ़की घटना ने मानव को प्राकृतिक आपदाओं पर नए सिरे से सोचने के लिए विवश किया है। इस आपदा के विभिन्न पक्षों पर विश्लेषणात्मक आलेख इस अंक में प्रस्तुत है।

इसके अतिरिक्त दो आर्थिक आलेखों आर्थिक समीक्षा एवं उत्तर प्रदेश बजट तथा हालिया संपन्न विधानसभा चुनावों पर भी सामयिक आलेख प्रस्तुत है।

इस अंक के साथ अर्पण सप्तम के अंतर्गत चयनित प्रतिभाओं का मार्गदर्शन पत्रिका के पाठकों को नि:शुल्क उपलब्ध कराया गया है। पूर्व की भांति करेंट अफेयर्स प्वॉइंटर का मासिक संकलन तो है ही। पाठकों से अनुरोध है कि अंक पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य संप्रेषित करें।


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