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Post at: Sep 02 2021

IPCC की जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट, 2021

वर्तमान संदर्भ

  • विगत 9 अगस्त, 2021 को जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) द्वारा अपने छठे आकलन रिपोर्ट का पहला भाग जारी किया गया। इसका शीर्षक है, ‘क्‍लाइमेट चेंज-2021: दि  फिजिकल साइंस बेसिस’।
  • उल्‍लेखनीय है कि इस रिपोर्ट के शेष दो भाग वर्ष 2022 में जारी किए जाएंगे।

पृष्ठभूमि 

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने संयुक्त रूप से वर्ष 1988 में IPCC की स्थापना की थी। 
  • इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन का वैज्ञानिक आकलन करना एवं उसके अनुकूलन तथा शमन हेतु उपाय सुझाना है |
  •  ध्यातव्य है कि IPCC की पांचवीं आकलन रिपोर्ट, 2014 में प्रकाशित की गई थी।

रिपोर्ट में उठाए गए प्रमुख बिंदु 

  • पूर्व औद्योगिक युग के बाद से अब तक वैश्विक तापमान में 1.07 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है।
  • इसके अनुसार, यदि शीघ्र ही उत्सर्जन में कमी के उचित उपाय नहीं अपनाए गए, तो अगले दो दशकों में पृथ्वी का तापमान पूर्व औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर जाएगा | 
  • यहां तक कि IPCC द्वारा अनुमान व्यक्त किया गया है कि यदि कार्बन उत्सर्जन को नहीं रोका गया, तो अधिक उत्सर्जन की दशा में धरती का औसत तापमान वर्ष 2100 तक 5.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
  • IPCC के अनुसार, सदी के अंत तक भूमंडलीय ऊष्मण को 1.50 डिग्री सेल्सियस के स्तर पर रोकना अभी भी संभव है। यद्यपि इसके लिए क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे।
  • IPCC के अनुसार, पिछला दशक 125,000 वर्षों में  सबसे गर्म दशक था |
  • वर्ष 2019 पिछले 2 मिलियन वर्षों में सर्वाधिक कार्बन डाइऑक्‍साइड (CO2) की सांद्रता वाला वर्ष रहा। ध्यातव्य है कि वर्ष 1750 से अब तक कार्बन डाइआक्‍साइड के सांद्रण में 47 प्रतिशत तथा मीथेन (CH4)  की सांद्रता में 156 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
  • 2011-2020 के दशक में आर्कटिक सागर का औसत क्षेत्रफल अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गया, वहीं वैश्विक समुद्री स्तर माध्य (Global mean sea level) भी वर्ष 1900 के बाद तेजी से बढ़ा है। 
  • उल्‍लेखनीय है कि समुद्री जल स्तर में यह वृद्धि पिछले 300 वर्षों में सर्वाधिक है।
  • प्रस्तुत रिपोर्ट ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया है कि मानवीय गतिविधियों के प्रभाव से विगत 2000 वर्षों मे जलवायु अत्यंत तेजी से गर्म हुई है। जिसके लिए मुख्यत: जीवाश्म ईंधन का वृहत उपयोग जिम्मेदार है। उल्‍लेखनीय है कि धरती अपने कार्बन बजट की 86 प्रतिशत मात्रा पहले ही समाप्त कर चुकी है।
  • इस रिपोर्ट में संभावना व्यक्त की गई है कि ग्लोबल वार्मिंग से हिमांक का स्तर बदलेगा और हिम रेखाएं वर्तमान स्थिति से पीछे हटेंगी । इसी तरह ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे और वर्षा पैटर्न में बदलाव, जल चक्र का अनियमतीकरण व सूखा तथा बाढ़ जैसी चरम जलवायवीय घटनाओं में वृद्धि आएगी। 
  • मानसून के संदर्भ में देखा जाए, तो एरोसोल की वृद्धि के कारण पिछले कुछ दशकों में दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी वर्षां में कमी आई है। यद्यपि उम्मीद व्यक्त की गई है कि एरोसोल की मात्रा में कमी आने पर पुन: यह क्षेत्र भारी मानसूनी वर्षा प्राप्त करेगा।
  • भारत के संबंध में चिंता की बात यह है कि हिंद महासागर वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे आस-पास के क्षेत्रों के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की संभावना है।

आगे की राह

  • उल्‍लेखनीय है कि यह रिपोर्ट नवंबर, 2021 में होने वाले कॉप 26 (CoP 26) सम्मेलन से पहले आई है। अत: वैश्विक नेताओं द्वारा इस संबंध में उचित नीतियां बनाने एवं उन्हें कार्यान्वित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  • सभी राष्ट्रों द्वारा शुद्ध शून्य उत्सर्जन (Net Zero Emission) प्राप्त करने की प्रतिबद्धता दिखाते हुए कार्बन न्यूट्रल बनने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान संबंधी प्रावधानों को भी समग्र रुप से लागू करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।
  •  इस संदर्भ में जन जागरूकता अभियान चलाने की भी अत्यंत आवश्यकता है। उदाहरण के लिए निजी वाहनों की जगह सार्वजनिक परिवहन साधनों के उपयोग को बढ़ावा देना आदि।

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