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Post at: Aug 31 2021

हुती समुदाय और यमन विद्राेह

वर्तमान संदर्भ

  • हाल ही में सऊदी अरब द्वारा  यमन में जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक नई शांति पहल प्रस्तुत की गई  है, जिसके महत्वपूर्ण बिंदु निम्नवत हैं-

(i) संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में देशव्यापी युद्ध विराम तथा साथ ही हवाई तथा समुद्री मार्गों को पुन: खोलना। 
(ii) साना हवाई अड्डे को पुन: खोलना तथा होदेदाह (Hodeidah) बंदरगाह के माध्यम से ईंधन और खाद्य-सामग्री के आयात को स्वीकृति प्रदान करना।

  • वर्तमान में उक्त दोनों स्थानों पर रियाद के शत्रुओं अर्थात ईरान समर्थित हुती (Houthi) विद्रोहियों का नियंत्रण है।

(iii) सऊदी समर्थित सरकार और हुती विद्राहियों के बीच राजनीतिक वार्ता को बहाल करना।
 

पृष्ठभूमि

  • यमन में जारी संघर्ष की जड़ें वर्ष 2011 में हुए अरब क्षेत्र के लोकतांत्रिक आंदोलन , जिसे अरब स्प्रिंग (Arab Spring) के रूप में जाना जाता है, में खोजी जा सकती हैं।
  • इस दौरान हुए एक विद्रोह ने काफी लंबे समय से देश में शासन कर रहे सत्तावादी राष्ट्रपति अली अब्दुल्‍ला सालेह को अपने डिप्‍टी अब्दरब्बू मंसूर हादी को सत्ता सौंपने के लिए विवश कर दिया था।
  • मध्य पूर्व के सबसे गरीब देशों में से एक यमन में स्थिरता लाने के उद्देश्य से यह राजनीतिक परिवर्तन किया गया था।
  • परंतु राष्ट्रपति हादी को आतंकवादी हमलों, भ्रष्टाचार, खाद्य असुरक्षा और कई सैन्य अधिकारियों की पूर्व राष्ट्रपति सालेह के प्रति वफादारी सहित विभिन्‍न समस्याओं से निपटने के लिए संघर्ष करना पड़ा।
  • यमन में वर्तमान संघर्ष की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई जब हुतीशिया मुस्लिम विद्रोह आंदोलन द्वारा नए राष्ट्रपति की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उत्तरी साद प्रांत (Saada Province) और इसके पड़ोसी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया गया।
  • वर्ष 2014 के अंत में सना में हादी की सरकार को सत्ता से बेदखल करने के बाद से यमन हिंसा में घिर गया है, इस स्थिति ने सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन को हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया।
  • इस विद्रोह को सऊदी अरब और ईरान के बीच छद्म युद्ध के रूप में देखा गया, क्योंकि हुती को ईरान का समर्थन है, जबकि सऊदी अरब हुती के विरुद्ध है।
  • वर्ष 2014 से यमन बहुपक्षीय संघर्ष का सामना कर रहा है, जिसमें स्थानीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभिकर्ता शामिल हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु
(i) हुती का सामान्य परिचय

  • हुती जैदी शिया मुसलमानों का एक समूह है, जिसने लगभग 1,000 वर्षों तक इस क्षेत्र के एक राज्य पर शासन किया था।
  • 1980 के दशक में हुती का उदय हुआ तथा यमन के उत्तरी क्षेत्र में शिया इस्लाम की एक शाखा जायडिज्म के बागियों के साथ एक बड़ा आदिवासी संगठन बना।
  • यह पूरी तरह से सलाफी विचारधारा के विस्तार के विरोध में था। उन्होंने देखा कि अब्दुल्‍ला सालेह की आर्थिक नीतियों की वजह से उत्तरी क्षेत्र में असमानता बढ़ी।
  • वे इस आर्थिक असमानता से नाराज थे। 
  • 2000 के दशक में एक नागरिक सेना बनने के बाद उन्होंने वर्ष 2004 से 2010 तक सालेह की सेना से 6 बार युद्ध किया। 
  • वर्ष 2011 में अरब के हस्तक्षेप के बाद यह युद्ध शांत हुआ।
  • देश में शांति के लिए दो वर्ष तक वार्ता हुई लेकिन यह असफल रही।
  • तत्पश्चात, हुतियों ने नए सऊदी समर्थित यमनी नेता अबेद रब्बो मंसूर हादी को सत्ता से बेदखल कर दिया और राजधानी सना को अपने कब्जे में ले लिया।
  • इस प्रकार से नए सिरे से यमन संकट प्रारंभ हुआ, जो अनवरत जारी है।

(2) जायडिज्म और हुती की विचारधारा

  • सभी जैदी हुती नहीं हैं। शिया मुसलमानों का एक संप्रदाय है जैदी फाइवर, जो इमामत के उत्तराधिकार के विवाद में विकसित हुआ। 
  • इनकी धार्मिक मान्यताए ईरान, इराक और लेबनान के शिया संप्रदाय की तुलना में सुन्‍नी मान्यताओं के ज्यादा निकट है। 
  • इसे मानने वालों ने यमन के उत्तरी क्षेत्र में 893 ईस्वी में एक जैदी प्रांत की स्थापना की और यह वर्ष 1962 तक रहा।
  • हुतियों की राजनीतिक विचारधारा शाही शासन के खिलाफ है। 
  • ये इस्राइल, अमेरिका और सऊदी अरब को दुश्मन मानते हैं।
  • हुती विद्रोहियों का मानना है कि वो अपने प्रांत स्वायत्ता और बराबरी के हक के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सऊदी अरब समर्थित यमन सरकार उन्हें रोकना चाहती है।

(3) सऊदी अरब के हस्तक्षेप का कारण

  • शिया हुती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना (Sanna) पर कब्जा कर लिया और राष्ट्रपति हादी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को दक्षिणी हिस्से में सिमटना पड़ा, जिसके पश्चात सऊदी अरब ने यमन में हस्तक्षेप की शुरुआत की।
  • सऊदी अरब ने ईरान पर अरब प्रायद्वीप में अस्थिरता लाने और शिया हुती विद्रोहियों को आर्थिक सहायता देने का आरोप लगाया था। 
  • वस्तुत: सऊदी अरब की इस प्रायद्वीप मंे स्थिरता स्थापित करने की योजना रही है।

(4)  सऊदी अरब और ईरान के बीच झगड़े का कारण

  • यमन मध्य एशिया के सबसे गरीब देशों में से है, जो दो समुदायों की लड़ाई में फंसा है।
  • इन दो समुदायों में एक ओर जहां सुन्‍नी गुट का नेतृत्व सऊदी अरब कर रहा है, तो वही शिया समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले हुती विद्रोहियों को ईरान से समर्थन मिल रहा है।
  • सऊदी अरब सुन्‍नी प्रधान देश है तथा स्वयं को इस्लामी नेतृत्वकर्ता के रूप में दर्शाता है। साथ ही दोनों देशों की शासन प्रणाली में भी अंतर है। 
  • यमन का सामरिक महत्व होने के कारण सऊदी अरब और ईरान दोनों ही यहां अपना दबदबा कायम करना चाहते हैं। 
  • पर्शियन गल्फ में स्थित द्वीपों को लेकर भी दोनों देशों में मतभेद हैं।
  • सऊदी अरब, पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी चितिंत है, जिससे सऊदी राजशाही को सीधे तौर पर खतरा है।
  • इसके साथ ही सीरिया, लेबनान और इराक जैसे देशों में ईरान की स्थिति पहले से ही मजबूत है।
  • यदि ईरान अपनी जड़ें यमन में भी जमा लेता है, तो आने वाले वक्त में सऊदी अरब की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
  • ईरान परंपरागत रूप से अमेरिकी विरोधी रहा है, जबकि सऊदी अरब अमेरिका का प्रमुख सामरिक सहयोगी रहा है।

(5) यमन संकट की चुनौतियां तथा परिणाम
(i) इस संघर्ष में सबसे ज्यादा नुकसान यमन के नागरिकों को ही हुआ है।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वर्ष 2015 में सऊदी अरब के हस्तक्षेप के बाद से यमन में  कम-से-कम 10,000 लोग मारे गए हैं।
  • गठबंधन सेनाओं के हवाई हमलों से देश के बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचा है और जगह-जगह पर नाकाबंदी से भोजन और दवाओं की आपूर्ति में कमी आई है, जिससे यमन में मानव-आबादी तबाही की गर्त में पहुंच रही है।
  • संयुक्त राष्ट्र ने यमन संकट समाप्त न होने की स्थिति में भयंकर अकाल की चेतावनी दी है, जिससे आने वाले वक्त में यमन के हालत और भी बदतर हो सकते हैं।
  • यदि जल्द ही इन तक कोई सहायता नहीं पहुंची तो लगभग 12 मिलियन लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे। साथ ही देश को व्यापक स्तर पर हैजे का प्रकोप भी झेलना पड़ा है।
  • यूनिसेफ के अनुसार, यमन में हर 10 मिनट में एक बच्‍चे की मौत हो जाती है।
  • यमन के गृहयुद्ध का असर न सिर्फ यमन की गरीब जनता पर पड़ा है, बल्कि विश्व के अन्य देश भी इससे प्रभावित हुए हैं।
  • यमन में ज्यादातर बच्‍चे कुपोषण के शिकार हुए हैं, जिसके कारण पूरे यमन में शिक्षा और रोजगार जैसी गंभीर समस्या पैदा हो गई है।

(ii) यमन सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले एक जलडमरूमध्य पर स्थित है, जहां से अधिकांश तेलवाहक  जहाज गुजरते हैं।

 

  • यमन में जारी विद्रोह के कारण अक्सर ही खाड़ी देशों में तेल का उत्पादन प्रभावित होता है, जिसका असर दुनियाभर के बाजारों पर पड़ता है। 
  • डॉलर पर दबाव बढ़ने से अमेरिकी बाजार सहित एशियाई और यूरोपीय बाजार भी प्रभावित होते हैं और भारतीय शेयर बाजार भी काफी निचले स्तर तक पहुंच जाता है।


(iii) यमन में व्याप्त अस्थिरता के कारण उत्पन्‍न खतरे, जैसे कि अलकायदा तथा IS  से जुड़े हमले इत्यादि, पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय है।
(iv)  इस संघर्ष को शिया शासित ईरान और सुन्‍नी शासित सऊदी अरब के बीच एक क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष के हिस्से के रूप में भी देखा जाता है।

(6) भारत का हित

  • भारत की तेल सुरक्षा तथा इस क्षेत्र में रह रहे 8 मिलियन भारतीय प्रवासी जो भारत में प्रतिवर्ष 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की धनराशि प्रेषित करते हैं, पर विचार किया जाए, तो यमन में व्याप्त संकट भारत के लिए भी एक चुनौती है।
  • अत: पश्चिमी एशिया के संबंध में कोई भी निर्णय करते समय भारत इन देशों के साथ जटिल संबंधों के विभिन्‍न पहलुओं पर विचार करते हुए ही कोई निर्णय लेता है -

(i) भारतीय डायस्पोरा 
(ii) इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) की भूमिका

  • स्थापना :  25 सितंबर, 1969 को रबात (सऊदी अरब) में 
  • मुख्यालय : जेद्दा, सऊदी अरब

(iii) भारतीय तेल आयात
(iv) अमेरिकी हस्तक्षेप
(v) भारत में अल्पसंख्यकों की उपस्थिति
 

(7) यमन (Yemen)

  • राजधानी : सना (Sanna)
  • यह लाल सागर एवं अदन की खाड़ी के तट पर स्थित देश जो बॉब-अल-मंदेब (Bab-el-Mandeb) जलसंधि द्वारा अफ्रीका के जिबूती देश से अलग होता है। 
  • बॉब-अल-मंदेब जलसंधि लाल सागर और अरब सागर को जोड़ती है।
  • अरब प्रायद्वीप में सर्वाधिक वर्षा इसी देश में होती है
  • यहां के काॅफी बागानों को मोचा कहा जाता है।
  • इसका मुख्य बंदरगाह :  अल-हुदायदा बंदरगाह लाल सागर में स्थित है।
  • सोकोत्रा द्वीप (Socotra) : अरब सागर
  • पड़ोसी देश : सऊदी अरब (रियाद) और ओमान (मस्कट)

नोट- कर्क रेखा (Tropic of cancer)  सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान से गुजरती है, परंतु यमन से नहीं।

संकलन- शिशिर अशोक सिंह


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