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Post at: Aug 28 2021

तमिलनाडु में सभी जातियों के प्रशििक्षत अर्चकों की मंदिरों में नियुक्ति

वर्तमान परिदृश्य

  • तमिलनाडु सरकार ने 14 अगस्त, 2021 को हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग द्वारा प्रबंधित किए जा रहे; मंदिरों में विभिन्‍न जातियों के 24 अर्चकों (पुजारी) सहित, कुल 208 व्यक्तियों की नियुक्ति की। 
  • इससे पूर्व केरल के मंदिरों में भी दलित पुजारियों की नियुक्ति की गई थी।       

पृष्ठभूमि   

  • द्रमुक (CDMK) ने अपने चुनावी [2021, विधानसभा चुनाव] घोषणा-पत्र में, ऐसी व्यवस्था करने की घोषणा की थी। 
  • 14 अगस्त, 2021 को द्रमुक नीत गठबंधन सरकार के 100 दिन पूरे होने पर, घोषणा-पत्र के वादे को पूर्ण किया गया। 
  • सुधारवादी नेता पेरियार (ईवी रामास्वमी) का ‘पूजा का समान अधिकार’ आंदोलन भी इस निर्णय को लाने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है।  

मुख्य िबंदु  

  • मुख्यमंत्री ने विभिन्‍न श्रेणियों में, पदों पर नियुक्ति करते हुए 75 लोगों को ‘हिंदू धर्म और परमार्थ अक्षय निधि विभाग’ का नियुक्ति आदेश सौंपा।   
  • नियुक्ति पाने वालें में 24 अभ्यर्थी ऐसे हैं, जिन्होंने हिंदू मंदिरों में पुजारी बनने के लिए, राज्य सरकार द्वारा संचालित प्रशिक्षण केंद्र से अपना प्रशिक्षण पूर्ण किया है।  
  • वहीं 34 लागों ने अन्य ‘पाठशालाओं’ से अर्चक का प्रशिक्षण पूर्ण किया। 208 नियुक्तियों में भट्टाचार्य ‘ओधुवर्य’ पुजारी तथा तकनीकी एवं कार्यालय सहायक के पद शामिल हैं। 

  • सरकार ने ओधुवर्य की 20, पुसरी (Poosari) की 17, महावत की 1,  माली की 1 तथा  छाता वाहक की 1 नियुक्तियां की हैं।                     
  • ये नियुिक्तयां रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, ओप्‍पिलप्‍पन मंदिर, मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर, मदुरै और वायलुर मुरुगन मंदिरों में की गईं। 
  • 28 वर्षीय महिला, सुहंजना गोपीनाथ को चेन्‍नई के धेनुपुरीश्वर मंदिर में ‘ओधुवर्य’ नियुक्त किया गया है।  

प्रभाव- सकारात्‍मक  

  • जातिगत समानता बढ़ेगी तथा अन्‍य (गैर-ब्राह्मण) जातियों की सामाजिक एवं धार्मिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। 
  • संवैधानिक उपबंधों (अनुच्‍छेद 15, 25, 26) के उद्देश्य की पूर्ति होगी। 
  • गैर-ब्राह्मण जातियों को इस कार्य (पूजा, धार्मिक अनुष्ठान) के अयोग्‍य, मानने की मनोभावना कमजोर होगी। 
  • समाज में जातिगत विभेद कुछ हद तक कम होंगे। 
     

नकारात्‍मक प्रभाव    

  • जातिगत (ब्राह्मण-गैर ब्राह्मण) संघर्ष एवं विद्वेष बढ़ सकता है। 
  • कानून व्यवस्था की समस्या उत्‍पन्‍न हो सकती है। 

निष्कर्ष             

  • यह एक सकारात्मक पहल है, जो संविधान एवं विभिन्‍न सामाजिक धार्मिक सुधारकों की आकांक्षाओं को पूर्ण करता है। इस निर्णय को लागू करने में  सहमति ,समन्वय एवं संतुलन की आवश्यकता है, जिससे इसके दूरगामी एवं सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकें। 

अशोक कुमार तिवारी
 


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