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Post at: Jul 29 2021

आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय बैठक

वर्तमान परिप्रेक्ष्य-

  • 8 मई, 2021 को भारत ने ‘तीसरी आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय, (3rd Arctic Science Ministerial-ASM3) बैठक में भाग लिया।
  • इस बैठक का आयोजन 8 मई से 9 मई, 2021 तक किया गया।
  • भारत की ओर से विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस बैठक में हिस्सा लिया।

प्रमुख बिंदु-

  • पहली दो बैठकों ASM1 और ASM2 का आयोजन क्रमश: वर्ष 2016 (अमेरिका) और वर्ष 2018 (जर्मनी) में किया गया था।
  • ASM3 का आयोजन आइसलैंड (शिक्षा विज्ञान एवं संस्कृति मंत्रालय) और जापान (शिक्षा, संस्कृति खेल, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय) द्वारा संयुक्‍त रूप से टोक्‍यो में किया गया।
  • यह एशिया (टोक्‍यो, जापान) में आयोजित होने वाली पहली ‘आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय’ बैठक है।
  • ASM बैठकें, आर्कटिक परिषद में शामिल सदस्य देशों द्वारा की जाती हैं ।
  • इस बैठक में 27 देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। इस सम्मेलन में ‘नॉलेज फॉर ए सस्टेनेबल आर्कटिक’ (Knowledge for A sustainable Arctic) पर एक रिपोर्ट भी जारी की गई।

उद्देश्य-

  • आर्कटिक क्षेत्र के बारे में सामूहिक समझ बढ़ाने तथा इसकी निरंतर निगरानी पर जोर देते हुए शिक्षाविदों (academia), स्थानीय समुदायों (indigenous communities), सरकारों और नीति निर्माताओं (governments and policy makers) सहित विभिन्‍न हितधारकों को इस दिशा में अवसर प्रदान करना।

ASM3 का विषय (Theme)

  • ‘संवहनीय आर्कटिक के लिए जानकारी’ (Knowledge for a sustainable Arctic) बैठक का विषय था। इसके अतिरिक्‍त चार उप विषय: निरीक्षण करें, समझे, प्रतिक्रिया दें और मजबूत करें (Observe, Understand, Respond and Strengthen) भी थे।

आर्कटिक क्षेत्र को बनाए रखने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समन्‍वय की आवश्यकता

  • आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गर्मी और इसकी बर्फ का पिघलना वैश्विक चिंता का विषय है क्‍योंकि यह जलवायु एवं समुद्र स्तर को विनियमित करने और जैव-विविधता को बनाए रखने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • इसके अतिरिक्‍त, आर्कटिक और हिंद महासागर (जो भारतीय मानूसन को नियंत्रित करता है) के बीच करीबी संबंध होने के भी प्रमाण हैं इसलिए, भौतिक प्रक्रियाओं की समझ में सुधार करने और भारत के ग्रीष्मकालीन मानूसन पर आर्कटिक बर्फ के पिघलने के प्रभाव को कम करने की दिशा में यह महत्‍वपूर्ण है।

आर्कटिक क्षेत्र में भारत की उपस्थिति

  • वर्ष 1920 में पेरिस की स्वालबार्ड संधि (Svalbard Treaty) पर हस्ताक्षर के साथ भारत आर्कटिक क्षेत्र से जुड़ा।
  • जुलाई 2008 से, भारत का आर्कटिक में नॉर्वे के स्वालबार्ड क्षेत्र के न्‍यालेसुंड (NyAlesund, Svalbard Area) में हिमाद्री नामक एक स्थायी अनुसंधान स्टेशन है।
  • भारत ने वर्ष 2014 से कांग्‍सजोर्डन फियोर्ड (Kongsfjorden fjord) में इंडआर्क (Ind ARC) नामक एक ‘बहु-संवेदक यथास्थान वेधशाला (Multi-Sensor Moored obserwatory) भी तैनात की है।
  • आर्कटिक क्षेत्र में भारत के अनुसंधान कार्यों का समन्‍वयन, संचालन और प्रचार-प्रसार भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत गोवा स्थित ‘राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र’ (National Centre for Polar and Ocean Research-NCPOR) द्वारा किया जाता है।
  • वर्ष 2013 से भारत को 12 अन्‍य देशों के साथ आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्‍त है।

  • आर्कटिक परिषद, आर्कटिक में सहयोग को बढ़ावा देने वाला प्रमुख अंतर सरकारी मंच है।
  • आर्कटिक क्षेत्र, उत्तरी ध्रुव के चारों ओर एक विशाल बर्फीला क्षेत्र है, जो इस धरती के लगभग 1/6 भाग पर फैला है।
  • यह क्षेत्र बाह्य वैश्विक, पर्यावरणीय वाणिज्‍य एवं सामरिक ताकतों द्वारा उत्‍तरोत्‍तर प्रभावित हो रहा है। इन्‍हीं कारणों से यह वैश्विक मामलों को आकार देने में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने को तत्‍पर है।
  • आर्कटिक क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थायी पर्यटन और खनिज तेल एवं गैस की खोज को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत ने एक नया आर्कटिक नीति मसौदा भी तैयार किया है।

-सं० आदित्‍य भारद्वाज


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