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Post at: Jul 22 2021

मेकेदातु परियोजना : कावेरी नदी

वर्तमान परिदृश्य-

  • हाल ही में कर्नाटक सरकार ने कावेरी नदी पर मेकेदातु बांध बनाने की घोषणा की।
  • कर्नाटक सरकार की इस घोषणा का तमिलनाडु एवं पुडंुचेरी सरकार ने विरोध किया है।
  • पुड्डुचेरी सरकार के अनुसार इससे राज्य का कराईकल क्षेत्र गम्भीर रूप से प्रभावित होगा।

पृष्ठभूमि

  • मेकेदातु परियोजना को कर्नाटक सरकार द्वारा वर्ष 2017 में अनुमोदित किया गया था। जिसका उद्देश्य बंगलुरू शहर के लिए पीने के पानी के भंडारण और आपूर्ति के साथ-साथ 400 मेगावाॅट बिजली उत्पन्‍न करना है।
  • इस परियोजना के विरुद्ध तमिलनाडु सरकार द्वारा वर्ष 2018 में सर्वोच्‍च न्‍यायालय में अपील की गई थी।
  • जून, 2020 में तमिलनाडु ने कावेरी जल प्रबंधन अधिकरण की बैठक में इस परियोजना को लेकर पुन: अपना विरोध दर्ज कराया।

महत्वपूर्ण बिंदु

मेकेदातु परियोजना : एक नजर

  • इस परियोजना की कल्पना एक जल विद्युत परियोजना के तौर पर 2000 के प्रारम्भ में की गई थी।
  • 2013 में एक संतुलित जलाशय के रूप में प्रस्तावित
  • कैबिनेट द्वारा फरवरी 2017 में परियोजना को मंजूरी।
  • इस परियोजना में रामनगरम जिले की कनकापुरा के नज़दीक मेकेदातु के पास एक जलाशय का निर्माण (बंगलुरू से 100 किमी. दूर) करना है।
  • 2017 में लागत अनुमान 5912 करोड़
  • जलाशय की क्षमता 66 tmcft (Thousand million Cubic Feet)
  • बांध की ऊंचाई 99 मीटर तथा लम्बाई 674.5 मीटर है।
  • राज्य सरकार ने NGT के निर्णय की वैधता पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि जब यह मामला पहले से ही उच्‍चतम न्‍यायालय में विचाराधीन है तो एेसे में NGT द्वारा हस्तक्षेप उचित नहीं है।

इस परियोजना का तमिलनाडु द्वारा विरोध का कारण-

  • यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्‍यायाधिकरण (CWDT) के उस निर्णय के विरुद्ध है, जिसमें कहा गया था कि कोई भी राज्य अंतरराज्यीय नदियों के जल से दूसरे राज्य को वंचित नहीं कर सकता है।
  • तमिलनाडु सरकार का कहना है कि जब तक सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा परियोजना से संबंधित अनुमोदन प्राप्‍त नहीं हो जाता है, तब तक तमिलनाडु सरकार ऊपरी तट पर प्रस्तावित परियोजना का विरोध जारी रखेगी।
  • परियोजना से संबंधित अनुमोदन से पहले कर्नाटक सरकार को तमिलनाडु की सहमति के बगैर इस अंतरराज्यीय नदी पर जलाशय निर्माण का अधिकार नहीं है।

कावेरी नदी

  • दक्षिण भारत की गंगा कही जाने वाली कावेरी नदी का उद्ग्‍ाम पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पहाड़ी से हुआ है।
  • यह नदी कर्नाटक तथा उत्तरी तमिलनाडु से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में अपना जल प्रवाहित करती है।
  • कावेरी नदी एक सदानीरा नदी है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां हेमवती, सिमसा, अर्कवही, भवानी, काबिनी, लक्ष्मणतीर्थ आदि हैं।
  • कावेरी नदी पर, तमिलनाडु में होगेनक्‍कल जल-प्रपात तथा कर्नाटक में भारचुक्‍की और बालमुरी जल प्रपात अवस्थित हैं।
  • कावेरी नदी के जल के उपयोग को लेकर कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल तथा पुदुचेरी में विवाद है, इसी को कावेरी जल विवाद कहते हैं।

कावेरी जल विवाद

  • कावेरी नदी के जल को लेकर विवाद बहुत पहले से चला आ रहा है। इस संबंध में मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर राज्य के बीच दो समझौते 1892 में तथा 1924 में हुए थे।
  • इस समझौते में यह बात कही गई थी, कि ऊपरी तटवर्ती राज्‍य को किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य के लिए निचले तटवर्ती राज्य की सहमति प्राप्‍त करना अनिवार्य है।
  • कावेरी नदी जल विवाद का प्रारंभ तब हुआ था, जब वर्ष 1974 में कर्नाटक ने तमिलनाडु की सहमति के बिना अपने जलाशयों के पानी को मोड़ना प्रारंभ किया।
  • कावेरी नदी जल विवाद काे हल करने हेतु वर्ष 1990 में कावेरी जल विवाद न्‍यायाधिकरण की स्थापना की गई थी।
  • कावेरी जल विवाद पर न्‍यायाधिकारण द्वारा 2007 में फैसला दिया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2013 में इस आदेश से संबंधित अधिसूचना केंद्र सरकार ने जारी की।
  • न्‍यायाधिकरण ने अपने आदेश मे तमिलनाडु को 419 टीएमसी फुट, कर्नाटक 270 टीएमसी फुट, केरल को 30 टीएमसी फुट तथा पुदुचेरी को 7 टीएमसी फुट जल का आवंटन किया था।

निष्कर्ष-

इस प्रकार के विवाद को रोकने के लिए राज्‍यों को अपना क्षेत्रीय दृष्टिकोण छोड़ना पड़ेगा। जल जैसी मूलभूत आवश्यक वस्तुओं पर विवाद को आपसी बातचीत तथा समझदारी से हल करना चाहिए, जिससे राष्ट्र और जनता दोनों का हित सुरक्षित बना रहे। क्‍योंकि क्षेत्रीयता के आधार पर होने वाला विवाद राष्ट्रवाद को कमजोर करता है, जो कतई उचित नहीं है।

सं. अरविंद कुमार पांडेय


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