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Post at: Jul 22 2021

मराठा आरक्षण : असंवैधानिक

वर्तमान संदर्भ

  • हाल ही में, सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पांच न्‍यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने मराठा आरक्षण कानून को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि यह 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्‍लंघन करता है।
  • साथ ही पीठ ने यह भी कहा कि न तो मराठा आरक्षण देने हेतु असाधारण परिस्थतियां थीं,
  • और न ही राज्‍यों के पास सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को तय करने की शक्‍ति है!
  • यद्यपि पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि 2020-21 हेतु मेडिकल स्नातकोत्‍तर प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव नहीं किया गया है।

(1) पृष्ठभूमि

  • वर्ष 2017 में सेवानिवृत्त न्‍यायमूर्ति एन. जी. गायकवाड़ की अध्यक्षता में गठित 11 सदस्यीय समिति ने मराठा समुदाय को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (Socially and Educationally Backward Class- SEBC) के तहत आरक्षण की सिफारिश की थी।
  • नवंबर, 2018 में महाराष्ट्र विधानसभा ने ‘‘महाराष्ट्र राज्‍य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग अधिनियम’’ का प्रस्ताव पारित किया।
  • जिसके तहत मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत का आरक्षण राज्‍य के अधीन सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रदान किया गया।
  • वर्ष 2018 में बाॅम्बे उच्‍च न्‍यायालय ने आरक्षण को बरकरार रखते हुए कहा है कि आरक्षण की सीमा 16 प्रतिशत के बजाय शिक्षा में 12 प्रतिशत और नौकरियों में 13 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • 9 सितंबर, 2020 को सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा इसके क्रियान्‍वयन पर रोक लगा दी गई और इस मामले को भारत के मुख्य न्‍यायाधीश के पास एक बड़ी खंडपीठ को दिए जाने के लिए हस्तांतरित कर दिया।

(2) मराठा आरक्षण को चुनौती

(i) मराठा जाति संविधान के कई अनुच्‍छेदों के तहत SEBC (सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग) के रूप में योग्‍य नहीं है और समुदाय के दावे को पहले मंडल आयोग और अन्‍य राज्‍य पिछड़ा वर्ग आयोगों द्वारा खारिज कर दिया गया था।
(ii) महाराष्ट्र विधायिका में 11 अगस्त, 2018 को संविधान में 102वें संशोधन के लागू होने के बाद मराठा आरक्षण अधिनियम को लागू करने की विधायी क्षमता का अभाव है।

(3) मराठा आरक्षण को रद्द करने के कारण

(i) मौलिक अधिकारों का उल्‍लंघन

  • मराठा समुदाय हेतु आरक्षण की अलग व्यवस्था अनुच्‍छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्‍छेद 21 (विधि की सम्यक् प्रक्रिया) का उल्‍लंघन करती है।

(ii) मराठा आरक्षण दिए जाने से 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्‍लंघन करने वाली स्थिति एक ‘जाति शासित’ समाज का निर्माण करेगी।

  • 12 प्रतिशत (शिक्षा) और 13 प्रतिशत (नौकरियों में) मराठा आरक्षण ने कुल आरक्षण सीमा को शिक्षा में 64 प्रतिशत और नौकरी में 65 प्रतिशत तक बढ़ा दिया।

(4) वर्ष 1992 का इंद्रा साहनी वाद

  • वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में, मंडल कमीशन की रिपोर्ट को बरकरार रखा गया था तथा शीर्ष अदालत द्वारा दो महत्‍वपूर्ण बातें कही गई थीं-

(i) किसी समुदाय को आरक्षण प्रदान करने हेतु अर्हता कसौटी उसका ‘‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन’’ है।
(ii) अदालत ने ऊर्ध्वाधर आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को दोहराते हुए तर्क दिया, कि यह प्रशासन में ‘‘दक्षता’’ सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

  • साथ ही यह भी कहा कि दूर-दराज के इलाकों की आबादी को मुख्यधारा में लाने हेतु केवल कुछ असाधारण परिस्थितियों में ही 50 प्रतिशत के नियम में कुछ ढील दी जा सकती है।

नोट– तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

(5) महाराष्ट्र सरकार के तर्क-

(i) इंद्रा साहनी फैसले पर पुनर्विचार के लिए 11 न्‍यायाधीशों की खंडपीठ के पास भेजना चाहिए, क्‍योंकि इसमें एक मनमाने ढंग से सीमा का निर्धारण किया गया, जिस पर संविधान में कोई विचार नहीं किया गया है।
(ii) इंद्रा साहनी वाद के बाद में, सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा दिए गए कुछ फैसलों में, स्वयं ही इस नियम से छूट दी गई है।

(6) सर्वोच्‍च न्‍यायालय की टिप्‍पणियां

(i) अदालत ने कहा कि, वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी मामले पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

  • हालांकि वर्ष 1992 में अदालत द्वारा 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का निर्धारण मनमाने ढंग से किया गया था, किंतु यह अब संवैधानिक रूप से मान्‍यता प्राप्‍त है।

(ii) मराठा समुदाय एक प्रभावशाली अगड़ा समुदाय है तथा राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में शामिल है।

  • अत: अदालत ने मराठा समुदाय की स्थिति को असाधारण मामला नहीं माना है।

सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग तय करने की शक्‍ति

(iii) जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के तीन सदस्यों (बहुमत) का मानना था कि 102वें संविधान संशोधन के बाद राज्‍यों के पास ‘‘सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों’’ (SEBC) की पहचान करने का अधिकार नहीं है।

  • वहीं दो सदस्यों की राय इससे उलट थी।
  • केंद्र सरकार का पक्ष रहा है कि संविधान के 102वें संशोधन से राज्‍य सरकार को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) की सूची बनाने का अधिकार खत्‍म नहीं हो जाता है।

(7) 102वां संशोधन अधिनियम, 2018

  • इसके अंतर्गत, ‘‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’’ को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है।
  • इस अधिनियम के तहत संविधान में अनुच्‍छेद 338B और 342A को जोड़ा गया।
  • अनुच्‍छेद 338B : पिछड़े वर्गों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना से संबंधित है।
  • अनुच्‍छेद 342A : राष्ट्रपति को राज्‍य में ‘‘सामाजिक और शैक्षिक’’ रूप से पिछड़े समुदायों को अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करता है।

(i) कई राज्‍यों द्वारा इस संशोधन की व्याख्या पर सवाल उठाए गए हैं, उनका तर्क है कि यह संशोधन उनकी शक्तियों पर अंकुश लगाता है।
(ii) हालांकि, न्‍यायिक पीठ द्वारा एकमत से 102वें संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया।
(iii) पीठ की बहुमत राय के अनुसार, हालांकि ‘‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग’’ (SEBC) की पहचान केंद्रीय रूप से की जाएगी, किंतु फिर भी राज्‍य सरकारों के पास, आरक्षण की सीमा निर्धारित करने और ‘‘सहकारी संघवाद’’ की भावना में विशिष्ट नीति बनाने की शक्ति होगी।

नोट

(i) प्रत्‍येक राज्‍य और केंद्रशासित प्रदेश के संबंध में भारत के राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित SEBCs की एक ही सूची होगी और राज्‍य केवल इस सूची में बदलाव से संबंधित केवल सिफारिशें कर सकते हैं।

  • अर्थात राज्‍य के पास SEBCs की पहचान करने का अधिकार नहीं है।

(ii) यदि पिछड़े वर्गों की सूची में संशोधन किया जाना है, तो इसके लिए संसद द्वारा अधिनियमित कानून की आवश्यकता होगी।

(8) भारत में ओबीसी (OBC) आरक्षण

  • मंडल कमीशन रिपोर्ट (1991) के आधार पर अन्‍य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण शुरू किया गया था।
  • सरकारी नौकरियों और उच्‍च शिक्षण संस्थानों में OBC का कोटा 27 प्रतिशत आरक्षण है।
  • हालांकि, ओबीसी (OBC) आरक्षण के संबंध में क्रीमीलेयर की अवधारणा है।
  • केवल ‘नॉन-क्रीमीलेयर’ के तहत आने वाले ओबीसी लोगों को ही आरक्षण का लाभ मिलेगा।
  • क्रीमीलेयर अवधारणा ओबीसी के कुछ विशेषाधिकार प्राप्‍त सदस्यों को आरक्षण की सीमा से बाहर करने के लिए आय और सामाजिक स्थिति को मापदंडों के रूप में लाती है।
  • यह अवधारणा यह सुनिश्चित करने के लिए एक जांच भी रखती है कि आरक्षण का लाभ बाद की पीढ़ियों को नहीं मिले।

नोट

एम. नागराज वाद, 2006 में संविधान पीठ SC-ST कर्मचारियों को नौकरियों में पदोन्‍नति में आरक्षण का लाभ दिए जाने के लिए शर्तें तय की थीं।

– सं. शिशिर अशोक सिंह


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