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Post at: Jul 19 2021

‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया: वन ईयर ऑफ कोविड-19’ रिपोर्ट

वर्तमान परिदृश्य

  • मई, 2021 में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर सस्टेनेबल एंप्‍लायमेंट, बेंगलुरु द्वारा ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, वन ईयर ऑफ कोविड-19’ रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।
  • यह रिपोर्ट भारत में एक वर्ष की अवधि के दौरान रोजगार, आय, असमानता तथा गरीबी पर कोविड-19 के प्रभावों का उल्‍लेख करती है।
  • ध्यातव्य है कि इस रिपोर्ट से संबंधित आंकड़े मार्च 2020 से दिसंबर 2020 के मध्य की अवधि से संबंधित हैं।
  • यह रिपोर्ट उन नीतिगत उपायों की प्रभावशीलता की भी जांच करती है, जो अब तक राहत और सहायता प्रदान करने के लिए किए गए हैं।

रिपोर्ट से संबंधित महत्‍वपूर्ण बिंदु-

  • इस रिपोर्ट से संबंधित महत्‍वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं-

(1) रोजगार एवं आय पर प्रभाव

  • अप्रैल-मई 2020 में लागू लॉकडाउन के कारण 100 मिलियन से अधिक लोगों की नौकरियां छूट गईं। इनमें से अधिकांश श्रमिकों को जून, 2020 तक रोजगार प्राप्‍त हो गया था, पंरतु 2020 के अंत तक अभी भी 15 मिलियन लोग रोजगार से वंचित हैं।
  • चार सदस्यों के औसत परिवार वाले घरों के लिए जनवरी 2020 में प्रति व्यक्‍ति मासिक आय (5989 रुपया) की तुलना में अक्‍टूबर 2020 में प्रति व्यक्‍ति मासिक आय (4979 रुपया) में गिरावट दर्ज की गई है।
  • रोजगार तथा आय में गिरावट के फलस्वरूप सकल घरलू उत्‍पाद में श्रम का हिस्सा 2019-20 की दूसरी तिमाही में 32.5 प्रतिशत से गिरकर 2020-2021 की दूसरी तिमाही में 27 प्रतिशत (5.5 प्रतिशत की गिरावट) हो गया।
  • ध्यातव्य है कि महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश तथा दिल्‍ली जैसे उच्‍च औसत कोविड केस वाले राज्‍यों/संघ शासित प्रदेशों में रोजगार का सर्वाधिक नुकसान हुआ।
  • लॉकडाउन के कारण लोगों की गतिशीलता पर प्रतिबंध होने के कारण आर्थिक गतिविधियों में कमी के फलस्वरूप लोगों की आय में कमी आई।
  • ज्ञातव्य है कि लोगों की गतिशीलता में 10 प्रतिशत की गिरावट, आय में 7.5 प्रतिशत गिरावट के साथ जुड़ी थी।

(2) महिलाओं एवं युवा श्रमिकों पर प्रभाव

  • इस रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के दौरान और बाद के महीनों में 61 प्रतिशत कामकाजी पुरुष कार्यरत रहे हैं जबकि 7 प्रतिशत पुरुषों ने रोजगार को खो दिया और काम पर वापस नहीं गए।
  • महिलाओं के संदर्भ में केवल 19 प्रतिशत महिलाएं ही कार्यरत रहीं तथा 47 प्रतिशत महिलाओं को लॉकडाउन के दौरान रोजगार से नुकसान उठाना पड़ा और 2020 के अंत तक भी वे काम पर वापस नहीं आ सकीं।
  • पुरुषों की तुलना में महिलाओं के रोजगार खोने से संबंधित आंकड़े (प्रतिशत में) इस प्रकार हैं-

  • लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के साथ-साथ युवा श्रमिकों को भी रोजगार के नुकसान का सामना करना पड़ा। 15-24 आयु वर्ग के 33 प्रतिशत युवा श्रमिक दिसंबर 2020 तक रोजगार को प्राप्‍त करने में विफल रहे। 35-44 आयु वर्गों में यह संख्या लगभग 6 प्रतिशत थी।
  • विभिन्‍न आयु वर्गों के युवा श्रमिकों के रोजगार खाने से संबंधित आंकड़े (प्रतिशत में) इस प्रकार हैं-

(3) अनौपचारिक रोजगार में वृद्धि

  • दिसंबर 2019 से दिसंबर 2020 के मध्य औपचारिक वेतनभोगी श्रमिकों में से लगभग आधे अनौपचारिक कार्यों, जैसे स्वरोजगार (30 प्रतिशत), अनौपचारिक वेतनभोगी (9प्रतिशत) और अस्थिर वेतन (10प्रतिशत) की ओर रुख किया।
  • औपचारिक वेतनभोगी श्रमिकों का अनौपचारिक कार्यों की ओर रुख करने से संबंधित आंकड़े इस प्रकार है-

2020 में रोजगार व्यवस्था

  • इस दौरान कृषि, निमा्रण तथा लघु व्यापार का क्षेत्र फाल बैक सेक्‍टर (Fall back sector) के रूप में उभरा।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और पेशेवर सेवा क्षेत्रों में अन्‍य क्षेत्रों की तुलना में श्रमिकों का अधिक उत्‍प्रवाह (Out flow) देखा गया।
  • इस दौरान शिक्षा क्षेत्र के 18 प्रतिशत श्रमिक अब कृषि क्षेत्र में संलग्‍न थे जबकि स्वास्थ्य क्षेत्र के श्रमिकों का एक समान हिस्सा छोटे व्यपार में लगा था।
  • ध्यात्‍व्य है कि महामारी के दौरान श्रमिकों की मासिक आय में 17 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई, जिसमें स्व-रोजगार और अनौपचारिक वेतनभोगी श्रमिकों को कमाई का सबसे अधिक नुकसान हुआ।
  • वर्ष 2020 में, 2019 की तुलना में श्रमिकों की मासिक आय में गिरावट से संबंधित आंकड़े इस प्रकार हैं-

(4) गरीबी में वृद्धि

  • अप्रैल-मई 2020 के महीने में सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों ने किसी भी प्रकार की आय का उपार्जन नहीं किया, जबकि इसके विपरीत धनी परिवारों को अपनी पूर्व-महामारी आय का एक चौथाई से भी कम का नुकसान हुआ।
  • मार्च-अक्‍टूबर, 2020 के पूरे आठ महीने की अवधि में सबसे गरीब 10 प्रतिशत परिवारों में एक औसत परिवार ने 15700 रुपये या अपनी दो महीने की आय खो दी।
  • ध्यातव्य है कि महामारी के दौरान राष्ट्रीय न्‍यूनतम वेतन सीमा (अनूप सत्‍यथी समिति द्वारा अनुशंसित 375 रुपया प्रति-दिन) से नीचे रहने वाले व्यक्तियों की संख्या में 230 मिलियन की वृद्धि हुई है।
  • यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी दर में 15 प्रतिशत अंक तथा शहरी क्षेत्रों में लगभग20 प्रतिशत अंक की वृद्धि के बराबर है।
  • ज्ञातव्य है कि यदि महामारी का प्रकोप नहीं होता तो 2019 से 2020 के मध्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी में 5 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रों में 1.5 प्रतिशत की गिरावट होती तथा 50 मिलियन लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए होते।
  • गौरतलब है कि इस महामारी के दौरान गरीब परिवारों को अपने खाद्य उपभोग में कमी करके, संपत्‍ति बेचकर और मित्रों, साहूकारों तथा रिश्तेदारों से अनौपचारिक ऋण लेकर आय की क्षति का सामना करना पड़ा।

(5) सरकारी राहत उपायों का आंशिक प्रभाव

  • इस महामारी का मुकाबला करने के लिए केंद्र सरकार के साथ-साथ विभिन्‍न सरकारों ने अपने स्तर पर राहत उपायों का क्रियान्‍वयन किया।
  • इस महामारी के प्रभावों का सामना करने के लिए वर्ष 2020 में ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्‍याण योजना’ तथा ‘आत्‍मनिर्भर भारत’ पैकेज के हिस्से के रूप में घोषित नि:शुल्‍क राशन, नकद हस्तांतरण, मनरेगा, पीएम-किसान भुगतान तथा पेंशन भुगतान जैसे कुछ समर्थन उपाय किए गए।
  • इस महामारी के दौरान मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा जाल के रूप में महत्‍वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।
  • आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मनरेगा के तहत नवंबर 2020 तक 252 करोड़ से अधिक मानव कार्य-दिवस का क्रियान्‍वयन किया गया, जो पूर्व वर्ष की तुलना में 43 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
  • जबकि इस रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2020 के पश्चात मनरेगा के तहत काम की मांग करने वाले ग्रामीण उत्‍तरदाताओं में से मात्र 55 प्रश्तिशत लोग ही इसे प्राप्‍त कर सके हैं।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान 64 प्रतिशत गैर-प्रवासियों की तुलना में 81 प्रतिशत प्रवासियों के रोजगार समाप्‍त हो गए। जबकि 15 प्रतिशत गैर-प्रवासियों की तुलना में 31 प्रतिशत प्रवासियों की राशन तक पहुंच सुनिश्चित नहीं हुई है।

सुझाव

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मुफ्त राशन की पात्रता को 2020 के अंत तक बढ़ाना।
  • मौजूदा डिजिटल अवसंरचना का प्रयोग करते हुए विभिन्‍न संवेदनशील परिवारों को तीन माह के लिए 5000 रुपए का नकद हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करना। इसमें जन-धन खातों का प्रयोग किया जा सकता है, पंरतु यह सुविधा मात्र जन-धन खातों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए।
  • मनरेगा के कार्य दिवसों के विस्तार को 150 दिन करने के साथ-साथ मनरेगा के तहत प्राप्‍त होने वाली मजदूरी को बढ़ाकर राज्‍य के द्वारा प्रदान की जाने वाली न्‍यूनतम मजदूरी तक करना।
  • मनरेगा के बजट को कम से कम 1.75 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाना।
  • महामारी से सबसे अधिक प्रभावित जिलों में एक शहरी रोजगार कार्यक्रम पायलट प्रोजेक्‍ट के रूप में प्रारंभ करना, जो संभवत: महिला श्रमिक पर केंद्रित हो।
  • वृद्धावस्था पेंशन में केंद्रीय योगदान को कम से कम 500 रूपये तक बढ़ाना।
  • निर्माण कार्य करने वाले सभी मनरेगा श्रमिकों को ‘बिल्‍डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्‍शन वर्कर्स एक्‍ट’ के तहत पंजीकृत श्रमिकों के रूप में स्वचालित रूप से नामांकित करना ताकि वे सामाजिक सुरक्षा का लाभ प्राप्‍त कर सकें।
  • 2.5 मिलियन ‘आगनबाड़ी’ तथा ‘आशा’ कार्यकर्त्ताओं के लिए 30 हजार रुपये (50 हजार रुपये प्रति माह की दर से 6 महीने तक) का ‘कोविड कठिनाइ भत्ता’ (Covid harship allowance) घाेषित किया जाना चाहिए।

संकलन-आलोक कुमार पांडेय


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