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Post at: Jul 19 2021

संसदीय समितियां और उनका महत्‍व

वर्तमान संदर्भ-

  • हाल के दिनों में संसदीय समितियां 17कई मुद्दों को लेकर चर्चा में रही हैं-

(i) हाल ही में संसद द्वारा ‘‘दिल्‍ली राष्ट्रीय राजधानी राज्‍यक्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक, 2021’’ पारित किया गया, जिसे एक व्यापक परिवर्तनकारी विधेयक होने के बावजूद किसी संसदीय समिति (Parliamentary Committees) को नहीं भेजा गया।
(ii) सूचना प्रौद्योगिकी पर संसद की स्थायी समिति ने सोशल मीडिया प्‍लेटफार्मों के कथित दुरुपयोग के मुद्दे पर जवाब तलब करने हेतु फेसबुक को बुलाया।
(iii) सरकार द्वारा कृषि विधेयकों को राज्‍यसभा की प्रवर समिति को भेजने की विपक्ष की मांग को खारिज कर दिया गया।
(iv) महामारी के कारण, संसदीय स्थायी समितियों के कार्यकाल की अधिकांश अवधि व्यर्थ चली गई।

पृष्ठभूमि

संसदीय प्रणाली में दो तरीकों से विधायी प्रस्तावों (विधेयकों) की जांच की जाती है-

(i) सदन में चर्चा के माध्यम से

  • यह एक विधायी अनिवार्यता होती है। सभी विधेयकों को सर्वप्रथम चर्चा के लिए दोनों सदनों के पटल पर रखा जाता है।

(ii) संसदीय समिति के माध्यम से

  • जब किसी विधेयक पर अतिरिक्‍त जांच-पड़ताल और चर्चा की आवश्यकता होती है तो उसे एक संसदीय समिति के पास भेजा जाता है।
  • चूंकि संसद वर्ष में सामान्‍यत: 70 से 80 दिनों तक बैठक करती है, अत: सदन में प्रस्तावित प्रत्‍येक विधेयक पर विस्तार से चर्चा का समय नहीं मिल पाता है।
  • विधेयकों को संसदीय समितियों के पास भेजना अनिवार्य नहीं होता है।

महत्‍वपूर्ण तथ्य

(i) संसदीय समिति (Parliamentary committees)

एक संसदीय समिति वह समिति है-

(i) जो सदन द्वारा गठित होती है अथावा जिसे लोकसभा अध्यक्ष/सभापति नामित करते हैं।
(ii) जो लोकसभा अध्यक्ष/सभापति के निर्देशानुसार कार्य करती है।
(iii) जो अपनी रिपोर्ट (अथवा प्रतिवेदन) सदन को अथवा लोकसभा/सभापति को सौंपती है।
(iv) जिसका एक सचिवालय होता है, जिसकी व्यवस्था लोकसभा/राज्‍यसभा सचिवालय करता है।

  • भारतीय संविधान में ऐसी समितियों का उल्‍लेख है परंतु इन समितियों के गठन, कार्यकाल तथा कार्यों आदि के बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया है।
  • इस संदर्भ में संसद के दोनों सदनों के नियम ही प्रभावी होते हैं।

नोट- परामर्शदात्री समिति भी संसद सदस्यों से ही गठित होती है, लेकिन यह संसदीय समिति नहीं होती है।

  • संसदीय समितियां दो प्रकार की होती हैं:-

(1) स्थायी समितियां (Standing Committees)

  • ये समितियां स्थायी प्रकृति की होती हैं, जो निरंतरता के आधार पर कार्य करती हैं और जिनका गठन प्रत्‍येक वर्ष अथवा समय-समय पर किया जाता है।

(2) तदर्थ समितियां (Ad-Hoc Committee)

  • ये अस्थायी प्रकृति की होती हैं और इनका गठन प्रयोजनार्थ किया जाता है।कार्य को पूर्ण करने के उपरांत ये स्वत: ही समाप्‍त हो जाती हैं।

वित्तीय समितियां

(i) अनुच्‍छेद 105: संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्‍तियां विशेषाधिकार आदि।
(ii) अनुच्‍छेद 118: अपनी प्रक्रिया और अपने कार्य संचालन के विनियमन के लिए नियम बनाने की संसद की शक्‍ति।

(2) संसदीय समितियों के उद्देश्य-

(i) गहन संवीक्षा और सरकारी जवाबदेही को सुनश्चित करना।
(ii) गैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य करना।

  • दल-बदल विरोधी कानून समितियों पर लागू नहीं होता।
  • यही कारण है कि समितियों के निर्णय आमतौर पर दलीय आधार पर नहीं लिए जाते।

(iii) प्रासंगिक हितधारकों के साथ संलग्‍नता।
(iv) वित्‍तीय विवेक सुनिश्चित करना, इत्‍यादि।

(3) संसदीय समितियों का महत्‍व-

(1) अंतर-मंत्रालयी समन्‍वय-

  • संसदीय समितियों काे संबंधित मंत्रालयों/विभागों की अनुदान मांगों को देखने, उनसे संबंधित विधेयकों की जांच, साथ ही उनकी वार्षिक रिपोर्ट और दीर्घकालिक योजनाओं पर विचार-विमर्श करने तथा संसद को रिपोर्ट सौंपने का कार्य सौंपा जाता है।

(2) विधायी विशेषज्ञता प्रदान करना-

  • सामान्‍यत: सांसद विषयों के विशेषज्ञ नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में संसदीय समितियां सांसदों को विशेषज्ञता हासिल करने और संबंधित विषयों पर विस्तार से विचार करने का समय देती हैं।
  • साथ ही इन समितियों काे अपने कार्य के निष्पादन के दौरान विशेषज्ञ सलाह और सार्वजनिक राय प्राप्‍त करने का अधिकार होता है।

(3) विस्तृत जांच का साधन

  • संसदीय समितियां संदर्भित विषयों की बारीकी से जांच करती हैं, साथ् ही उक्‍त विषय के संदर्भ में विभिन्‍न हितधारकों के साथ-साथ आमजनों केविचारों को भी विमर्श के लिए आमंत्रित करती हैं।

(4) एक लघु संसद के रूप में व्यवहार

  • संसदीय समितियां एक लघु संसद के रूप में कार्य करती है, क्‍योंकि इनमें दोनों सदनों के विभिन्‍न दलों के सदस्य एकल हस्तांतरणीय मतदान प्रणाली के माध्यम से सम्मिलित किए जाते हैं और
  • सौंपे गए विषय पर गहन विचार-विमर्श करते हैं।

(5) जनदबाव से मुक्‍त

  • संसदीय समितियां लोक-लुभावन मांगों को लेकर दबावग्रस्त नहीं होती हैं, जिनकी वजह से सामान्‍यत: संसद बाधित होती रहती हैं।
  • अत: संसदीय समितियां विषयों का तटस्थतापूर्वक गहन संवीक्षा करने में समर्थ होती हैं

(6) पार्टीलाइन से मुक्‍त

  • संसदीय समितियों की बैठकें गुप्‍त होती हैं तथा समितियों के सदस्य पार्टी व्हिप द्वारा बाध्य नहीं होते हैं। अत: संसदीय समितियों के सदस्य पार्टीलाइन से हटकर विवेकानुसार विषयों पर बहस तथा चर्चा करते हैं।

(7) सरकार पर नियंत्रण-

  • यद्यपि समिति की अनुशंसाएं संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती हैं फिर भी सरकार के द्वारा समितियों के द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों और परामर्शों का एक सार्वजनिक अभिलेख (रिकार्ड) तैयार किया जाता है।
  • यह सरकार पर दबाव डालती हैं कि वह चर्चा योग्‍य विषयों/प्रावधानों के संदर्भ में अपने रुख पर पुनर्विचार करे।

(8) संसदीय समितियां सार्वजनिक प्रतिक्रिया प्राप्‍त करने और विवादास्पद मुद्दों पर राजनीतिक सहमति बनाने में भी मदद करती हैं।

(3) चुनौतियां-

(i) एक संसदीय लोकतंत्र में महत्‍वपूर्ण विधेयकों को जांच- पड़ताल हेतु संसदीय समितियों को भेजा जाता है।

  • भारतीय संसद के संदर्भ में, वर्ष 2009 से 2014 के बीच प्रस्तुत विधेयकों में से 71 % को जांच हेतु संसदीय समितियों को भेजा गया, पंरतु वहीं वर्ष 2014 से 2019 के बीच यह आंकड़ा केवल 25% रहा।
  • वर्तमान में संसदीय समितियों को दरकिनार करने या महत्‍व न देने का प्रचलन अंतत: लोकतंत्र को ही कमजोर करता है।
  • समितियों को तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु विशेषज्ञ कर्मचारी उपलब्ध नहीं है।
  • सांसदों की अनुपस्थिति कोरम पूर्ण करने में भी समस्या पैदा करती है।
  • समितियों की अनियमित बैठके।

(ii) भारतीय संसदीय प्रणाली में सभी विधेयकों को समितियों के पास भेजे जाने की अनिवार्यता नहीं है। यह कार्य सदन के अध्यक्ष (लोकसभा में स्पीकर और राज्‍यसभा में सभापति) के विवेकाधीन है।

  • अध्यक्ष के विवकाधीन होने से मुख्यत: लोकसभा जहां बहुमत सत्‍तारूढ़ दल के पास होता है, संसदीय समितियां अपने उद्देश्यों की प्राप्‍ति में कमजोर साबित होती हैं।

आगे की राह–

  • स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों में सभी विधेयक समितियों के पास भेजे जाते हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया में विपक्ष के सदस्यों को शामिल कर एक समिति बनाई जाती है, जो उन विधेयकों को चिह्नित करती है, जिन्‍हें समितियों को भेजा जाना चाहिए।
  • भारत में भी संसदीय समिति प्रणाली को दरकिनार करने की बजाय उसके महत्‍व को पहचानने और बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
  • साथ ही यह भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि सदन की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों में संशोधन कर कुछ विशेष विषयों या मुद्दों को समाहित करने वाले विधेयकों को अनिवार्यत: संसदीय समितियों को भेजा जाए।
  • चंूकि संसदीय समितियां सदस्यों को एक मंच प्रदान करती हैं जहां सदस्य विचार-विमर्श के दौरान संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
  • अत: बदलते परिदृश्य के साथ संसदीय प्रणाली को समायोजित करने और अर्थपूर्ण बनाने के लिए संसदीय समिति प्रणाली को भी मजबूत करने की आवश्कयता है।

शिशिर अशोक सिंह


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