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Post at: Jul 13 2021

अमेरिकी ‘मुद्रा निगरानी’ सूची में भारत

वर्तमान संदर्भ-

  • हाल ही में, अमेरिका ने भारत समेत 11 देशों को उनकी मुद्रा के व्यवहार को लेकर ‘‘करंेसी मैनिपुलेटर्स (Currency Manipulators) (मुद्रा के साथ छेड़छाड़ करने वाले देश) की निगरानी सूची’’ या ‘‘मुद्रा व्यवहार निगरानी सूची’’ में डाल दिया है।
  • इससे पहले वर्ष 2018 में भी भारत को इस सूची में डाला गया था, लेकिन िफर वर्ष 2019 में हटा दिया गया था।

महत्‍वपूर्ण बिंदु

1. अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने भारत सहित कुल 11 देशों को ताजा सूची में शामिल किया है।

  • इनमें भारत, सिंगापुर, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आयरलैंड, इटली, मलेशिया, थाईलैंड, जर्मनी और मैक्‍सिको शामिल हैं।

2. करंेसी मैनिपुलेटर्स

  • वोमनिबस ट्रेड एण्ड कॉम्पीटिटिवनेस एक्‍ट (The Omnibus Trade and Competitiveness Act) 1988, की धारा 3004 के अनुसार ट्रेजरी सचिव ‘‘इस बात पर विचार करें कि क्‍या कोई देश अपनी मुद्रा और अमेरिकी डॉलर के बीच विनिमय दर में हेरफेर करते हैं ताकि भुगतान संतुलन के प्रभावी समायोजन को रोका जा सके या अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनुचित प्रतिस्पर्धात्‍मक लाभ प्राप्‍त किया जा सके।’’
  • यदि कोई देश अपनी मुद्रा का अवमूल्‍यन कर दे तो उसके देश की निर्यात की लागत कम हो जाती है।
  • सस्ता होने से निर्यात की मात्रा बढ़ जाती है और किसी देश के साथ उसके व्यापारिक संतुलन (Trade Balance) में बदलाव जाता है।

3. करेंसी मैनिपुलेटर्स वॉच लिस्ट

  • अमेरिकी ट्रेजरी डिर्पाटमेंट की तरफ से व्यापारिक साझेदार देशों की एक सूची बनाई जाती है, जिनमें ऐसे भागीदार देशों की मुद्रा के व्यवहार और उनकी वृहद आर्थिक नीतियों पर बारीकी से नजर रखी जाती है।
  • यह अमेरिका के 20 सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के मुद्रा व्यवहारों की समीक्षा करता है।
  • अमेरिका किसी देश को इस सूची में डालता है तो उस पर तुरंत तो कोई जुर्माना नहीं लगाया जाता, लेकिन इस सूची में शामिल होने के बाद उस देश की वैश्विक वित्त बाजार में साख अवश्य कम हो जाती है।

4. अमेरिकी मानदंड

  • अमेरिका के वर्ष 2015 के ‘‘ट्रेड फैसिलिटेशन एंड ट्रेड इंफोर्समेंट एक्ट’’ के मुताबिक कोई भी अर्थव्यवस्था जो कि निम्नलिखित तीन मानदंडों में से दो का उल्‍लंघन करती है, उसे निगरानी सूची में रखा जाता है:-

(i) किसी देश का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार में एक साल (12 माह) के दौरान कम-से-कम 20 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्‍लस) हो जाए।
(ii) एक वर्ष (12 माह) के दौरान किसी देश का चालू खाता अधिशेष (करंट अकाउंट सरप्‍लस) उसके सकल घरेलू उत्‍पाद (GDP) के कम-से-कम 2% तक हो जाए।
(iii) किसी देश के द्वारा एक वर्ष (12 माह) के भीतर कम से कम 6 माह तक विदेशी मुद्रा की खरीद उसके सकल घरेलू उत्‍पाद (GDP) का कम-से-कम 2% हो जाए

5. भारत की स्थिति

  • भारत को तीन में से दो मानदंडों के आधार पर इस सूची में डाला गया-

(i) व्यापार अधिशेष
(ii) निरंतर एकतरफा हस्तक्षेप

  • हाल ही में, भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष 20 अरब डाॅलर से अधिक हो गया।
  • आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 के जून माह तक भारत ने 64 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की खरीद की थी।
  • यह संख्या जीडीपी (GDP) का 2.4% है।

(6) भारत की प्रतिक्रिया-

  • भारत ने अमेरिका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट द्वारा मुद्रा व्यवहार में छेड़छाड़ करने वालों को निगरानी सूची में डालने के आधार को खारिज कर दिया।
  • भारत का तर्क यह है कि दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा जिस प्रकार से पूंजी का प्रवाह किया जा रहा है, उस स्थिति में मुद्रा के प्रबंधन के लिए उसके (भारत) द्वारा उठाए जा रहे कदम आवश्यक थे।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, अब रिजर्व बैंक को डॉलर की खरीद से वास्तव में बचना चाहिए क्‍योंकि 500 अरब डॉलर का मुद्रा भंडार हमारी एक वर्ष की आयात जरूरतों के लिए पर्याप्‍त

प्रभाव

(i) करेंसी मैनीपुलेटर सूची तात्‍कालिक रूप से भारत पर किसी प्रकार का आर्थिक प्रतिबंध आरोपित नहीं करती है।
(ii) आरबीआई पर दबाव होगा कि वह डॉलर की खरीद कम करे।
(iii) रुपये की मजबूती से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में निर्यात पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ेगा।
(iv) भारत के व्यापार घाटे में वृद्धि की संभावना है।
(v) परंतु कच्‍चे तेल का आयात सस्ता हो सकता है।

                                                                                                 सं. शिशिर अशोक सिंह


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