Contact Us - 0532-246-5524,25 | 9335140296
Email - ssgcpl@gmail.com
|
|

Post at: Jul 13 2021

सी-बक्थोर्न रोपण

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में सी-बक्थोर्न के पौधों को लगाने का निर्णय लिया है।
  • इसका कारण इस पौधे का औषधीय, पर्यावरणीय एवं आर्थिक महत्व है।

महत्वपूर्ण बिंदु-

  • हिमाचल प्रदेश सरकार ने घोषणा की है कि अगले पांच वर्षों में राज्य में 250 हेक्टेयर पर सी-बक्थोर्न के पौधे लगाए जाएंगे।
  • सी-बक्थोर्न का वाणिज्यिक महत्व भी है, क्योंकि इसका उपयोग रस, जैम, पोषण संबंधी कैप्सूल आदि बनाने में किया जाता है।

सी-बक्थोर्न रोपण के विषय में

  • यह एक औषधीय पौधा है । औषधि बनाने हेतु इसकी पत्तियों फूलों और फलों का उपयोग किया जाता है।
  • इसका वैज्ञानिक नाम Hippophae rhamnoides है। यह Elaeagnaceae परिवार से समूह से ताल्‍लुक रखता है।
  • इसे अन्य नाम से भी जाना जाता है, जैसे-सैंडथॉर्न शैलोथाॅर्न और सीबेरी ।
  • यह पौधा भारत में हिमालय क्षेत्र के ट्रीलाइन से ऊपर पाया जाता है।
  • इसका बड़ा हिस्सा-हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, उत्तराखंड सिक्‍किम और अरुणाचल प्रदेश में आच्छादित है।

पारिस्थितिकीय एवं औषधीय लाभ

  • हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में पाई जाने वाली झाड़ियों में लगने वाला फल ‘सीबकथॉर्न मधुमेह एवं लिवर रोगों पर नियंत्रण एवं उपचार में उपयोगी साबित होता है।
  • इसमें विटामिन C की प्रचुर मात्रा होती है। जो संपूर्ण विश्व की आवश्यकता पूर्ण कर सकती है।
  • यह कठोर स्थानीय परिस्थिति की रक्षा हेतु एक अच्छा विकल्प साबित हुआ है।
  • सी-बक्थोर्न शुष्क क्षेत्रों में अच्छी तरह से विकास करता है और यह सबसे अधिक हिमालय के ग्लेशियर जैसे क्षेत्रों के आस-पास में, जहां पानी का प्रवाह कम तथा प्रकाश की मात्रा अधिक पहुंचती है ज्यादा विकसित हो सकते हैं। व्यापक रूप से सी-बक्थोर्न का प्रयोग पेट,हृदय और त्वचा के रोगों के इलाज में किया जाता है।

सैन्य एवं अंतरिक्ष मिशन में उपयोग

  • सी-बक्थोर्न का रस (Juice)-20OC पर भी नही जमता (Freeze) इस कारण कारगिल, द्रास जैसे दुर्गम क्षेत्र में तैनात सेना के जवानों के लिए भी उपयोगी है।
  • चूंकि विकिरण को रोकने की भी अपार क्षमता होने के कारण अंतरिक्ष मिशन में इससे बने क्रीम का प्रयोग होता है।

अन्य उपयोग

  • सी-बक्थोर्न एक मिट्टी को बांधकर रखने वाला पौधा है जो मिट्टी के कटाव को रोकता है, नदियों में गाद की जांच करता है।  नाइट्रोजन स्थिरीकरण और बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने में सहायक है।
  • ईंधन व चारे के रूप में एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

ट्री लाइन

  • वह सर्वोच्‍च स्थल जिसके ऊपर वृक्ष नही पाये जाते हैं विषम जलवायविक दशाओं/न्यूनतम तापमान और मिट्अी के अभाव के कारण् वृक्षों का विकास नही हो पाता है। ।
  • ट्री लाइन से परे पेड़ पर्यावरणीय परिस्थिितयों (आमतौर पर ठंडे तापमान, अत्यधिक नमी की कमी) को सहन नहीं कर सकते हैं।

शीत मरुस्थल

  • शीत मरूस्थल दक्षिण मंे किन्नौर से लेकर उत्तर में लद्दाख तक फैला हुआ है, जो कि हिमालय में स्थित है।
  • शीत मरूस्थलीय क्षेत्रों में हिमपात, बर्फीले तूफान इत्यादि घटनाएं आम होती हैं।
  • ऐसे क्षेत्रों में जल संसाधन बहुत कम पाए जाते हैं।
  • इस क्षेत्र की मिट्टी बहुत अधिक उपजाऊ नहीं होती है।
  • ‘सीबकथाॅर्न एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के अनुसार, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्‍किम और अरुणाचल प्रदेश में लगभग 15,000 हेक्टेयर क्षेत्र इस पौधे से आच्‍छादित है द्वारा कवर की जाती है।

संकलन-दीपक पांडेय


Comments
List view
Grid view

Current News List