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बेनामी लेन-देन अधिनियम की धारा 3(2) असंवैधानिक

बेनामी लेन-देन अधिनियम :  पृष्ठभूमि

  • मूलत: बेनामी लेन-देन अधिनियम को वर्ष 1988 में अधिनियमित किया गया था।
  • इस अधिनियम का उद्देश्य बेनामी लेन-देन को प्रतिबंधित करना एवं उचित रूप से धारित बेनामी की वसूली का अधिकार प्रदान करना था।
  • वर्ष 2016 में मूल अधिनियम को संशोधित कर बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन अधिनियम, 2016 को अधिनियमित किया।

कब हो सकता है बेनामी लेन-देन ?

  • अधिनियम के अनुसार-
  • एक संपत्ति का किसी व्यक्ति के पास होना; परंतु किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रदान या भुगतान किया जाना।
  • फर्जी (Fake )  नाम से किया गया लेन-देन।
  • संपत्ति हेतु दावा करने वाला व्यक्ति का सुराग (Trace)  योग्य न होना।

बेनामी अधिनियम से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • ध्यातव्य है, कि अधिनियम न्याय निर्णायक प्राधिकारी के द्वारा पारित किसी भी आदेश के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई हेतु एक अपीलीय न्यायाधिकरण का प्रावधान करना है।
  • इस अपीलीय न्यायाधिकरण के खिलाफ उच्‍च न्यायालय में सुनवाई हो सकती है।
  • अधिनियम के अनुसार, बेनामी अधिनियम से संबंधित विशेष न्यायाधिकरण को शिकायत दर्ज होने की तरीख से छह माह के भीतर मुकदमे की सुनवाई आवश्यक है।

  • पहल अधिकारी को यदि यह समाधान हो जाए कि व्यक्ति एक बेनामीदार है, तो वह उस व्यक्ति को नोटिस जारी कर सकता है।
  • अनुमोदन अधिकारी की अनुमति के अधीन पहल अधिकारी नोटिस जारी होने की तारीख से 90 दिनों हेतु संपत्ति को अधिकार में ले सकता है।
  • ध्यातव्य है, कि न्यायनिर्णयन प्राधिकारी मामले से संबद्ध एवं दस्तावेजों का अनुवीक्षण करता है एवं फिर एक आदेश पारित करता है कि संपत्ति को बेनामी के रूप में रखा जाए या नहीं।

दण्ड का प्रावधान 

  • उल्‍लेखनीय है, कि यदि कोई व्यक्ति सक्षम न्यायालय द्वारा बेनामी लेन-देन के अपराध में दोषी पाया जाता है, तो उसे न्यूनतम (कम-से-कम) एक वर्ष की अवधि के लिए कारावास की सजा हो सकती है एवं 3 से 7 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ

  • अगस्त, 2022 में भारत के सर्वोच्‍च न्यायालय ने बेनामी लेन-देन (निषेध) अधिनियम, 1988 की धारा 3(2) को स्पष्टतया स्वैच्‍छिक होने के कारण असंवैधानिक घोषित कर दिया।
  • न्यायालय ने धारित किया कि संशोधित अधिनियम, 2016 केवल संभावित रूप से लागू किया जा सकता है।

फैसले से संबंधित मुख्य बिंदु

  • सर्वोच्‍च न्यायालय द्वारा यह फैसला ‘‘भारत संघ बनाम M/S गणपति डीलकॉम प्राइवेट लिमिटेड, सिविल अपील नं. 5783 ऑफ 2022’’ नामक वाद में सुनाया गया।
  • सर्वोच्‍च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यह अधिनियम पूर्वव्यापी (Retrospective) से लागू नहीं हाे सकता ।

संकलन-आलोक त्रिपाठी
 


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