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Post at: Aug 30 2022

SSLV की प्रथम उड़ान

पृष्ठभूमि

  • देश की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (ISRO) ने विगत वर्षों के दौरान ‘प्रक्षेपण यानों’ (launch vehicles) की पांच पीढ़ियों यथा SLV-3, ASLV, PSLV, GSLV तथा GSLV Mk-III का सफलतापूर्वक विकास किया है।
  • वर्तमान में कार्यशील PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle), GSLV (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle) तथा GSLV Mk-III अत्यधिक शक्तिशाली प्रमोचन यान हैं और ये अत्यधिक वजनी नीतभार (Payloads) को प्रमोचित करने में सक्षम हैं।
    • हालांकि‚ किसी ‘भू-परिक्रमण उपग्रह’ (Earth Orbiting Satellite) को ‘पृथ्वी की निम्न कक्षा’ (Low Earth Orbit) में स्थापित करने के लिए इतने शक्तिशाली रॉकेटों की आवश्यकता नहीं होती।
    • अभी तक ISRO द्वारा लघु उपग्रहों (Small Satellites) को PSLV के माध्यम से विशाल उपग्रहों के साथ सह-यात्री (Co-Passengers) के रूप में भेजा जाता रहा है।
    •  स्पष्ट है‚ कि इसरो द्वारा लघु उपग्रहों का प्रक्षेपण‚ बड़े उपग्रहों के प्रमोचन अनुबंध (Launch Contract) पर ही निर्भर रहा है।

SSLV

  • SSLV, ISRO का एक नया प्रक्षेपण यान है।
  • उभरते हुए वैश्विक लघु उपग्रह प्रमोचन सेवा बाजार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ISRO ने SSLV का विकास किया है।
    • SSLV का पूर्ण रूप है :- ‘लघु उपग्रह प्रमोचन वाहन’ (Small Satellite Launch Vehicle)।

विशेषताएं

  • SSLV की ऊंचाई (height) 35 मीटर‚ व्यास (diameter) 2 मीटर तथा उत्थापन द्रव्यमान (Lift off Mass) 120 टन है।
  • यह 10-500 किग्रा. भार तक के छोटे‚ सूक्ष्म एवं नैनो उपग्रहों (Mini, Micro & Nano Satellites) को 500 किमी. की ग्रहीय कक्षा (Planar Orbit) में प्रमोचित करने में सक्षम है।
  • SSLV एक त्रि-चरणीय (three-stage) रॉकेट है‚ जिसके सभी चरण ठोस प्रणोदक-युक्त (Solid Propulsion Stages) हैं।
    • सभी तीनों चरणों को ऊर्जा प्रदान करने के लिए HTPB (Hydroxyl-Terminated Polybutadiene) आधारित प्रणोदक का प्रयोग किया गया है।
  • SSLV का सबसे ऊपरी भाग (terminal stage) VTM (Velocity Trimming Module) से लैस है‚ जो द्रव-प्रणोदक आधारित (liquid propulsion-based) है।
    • VTM में संग्रहणीय तरल (storable liquid) MMH Mono Methyl Hydrazine) तथा MON3 (Mixed Oxides of Nitrogen) का प्रयोग किया गया है।
  • जहां SSLV के प्रथम तीन चरण पेलोड (payloads) को वांछित ऊंचाई तक लेकर जाते हैं‚ वहीं VTM के जरिए उपग्रह को लक्षित कक्षा में स्थापित किया जाता है।

 

  • SSLV का डिजाइन एवं विकास तिरुवनंतपुरम (केरल) स्थित ‘विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र’ (VSSC) द्वारा किया गया है।
  • जबकि VTM का विकास वलियामाला‚ तिरुवनंतपुरम (केरल) स्थित ‘द्रव नोदन प्रणाली केंद्र’ (LPSC : Liquid Propulsion Systems Centre) ने किया है।

लाभ

  • SSLV को ‘मांग आधारित प्रमोचन’ (launch-on-demand) आधार पर प्रमोचन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए विकसित किया गया है। 
  • यह मांग के आधार पर कम लागत में अंतरिक्ष में प्रवेश की सुविधा प्रदान करता है।
  • अन्य प्रमुख लाभ निम्नवत हैं -

    (i)    निम्न प्रतिवर्तन काल (low turn-around time) 
    (ii)    अनेक उपग्रहों को वहन करने की क्षमता 
    (iii)    न्यूनतम प्रमोचन अवसंरचना आवश्यकताएं (minimal launch infrastructure requirements) आदि।

SSLV, PSLV, GSLV तथा GSLV Mk-III : तुलनात्मक अध्ययन

  • उल्लेखनीय है‚ कि SSLV एक नवाचारी प्रक्षेपण यान है‚ जिसे असेंबल (assemble) करने में मात्र 72 घंटे (3 दिन) का समय लगता है और इस काम में मात्र 6 व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
  • इसके विपरीत PSLV को असेंबल करने में सामान्यत: 60-70 दिन का समय लगता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • 7 अगस्त‚ 2022 को SSLV की प्रथम विकासात्मक उड़ान (SSLV-D1/EOS-02 मिशन) संपन्न हुई।
  • सद्य: मिशन के तहत SSLV को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र शार के प्रथम लांच पैड से प्रक्षेपित किया गया।

मिशन का विवरण

  • सद्य: मिशन के तहत SSLV के माध्यम से दो उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया।
  • ये दो उपग्रह हैं :- 

    (i) EOS-02
    (ii) आजादीसैट (AzaadiSAT) 

  • सद्य: मिशन के तहत दोनों उपग्रहों को भू-मध्य रेखा (equator) से लगभग 356 किमी. की ऊंचाई पर स्थित ‘वृत्ताकार निम्न-भू-कक्षा’ (circular low-Earth Orbit) में स्थापित किया जाना था।
    •  हालांकि‚ यह मिशन दोनों उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करने में असफल रहा।
    •  SSLV-D1 ने उपग्रहों को वृत्ताकार कक्षा की बजाए दीर्घवृत्ताकार कक्षा (elliptical Orbit) में स्थापित कर दिया और इस प्रकार ये दोनों उपग्रह काम में आने लायक नहीं रह गए।
  • प्रक्षेपण के उपरांत SSLV-D1 के तीनों चरणों ने योजना के अनुरूप कार्य किया‚ लेकिन उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के दौरान VTM के एक सेंसर में खराबी के चलते यह मिशन विफल हो गया।

 

EOS-02

  • EOS-02, इसरो द्वारा डिजाइन किया गया एक भू-प्रेक्षण (Earth Observation) उपग्रह है।
  • यह ‘उच्च स्थानिक विभेदन क्षमता’ (high spatial resolution) से लैस एक प्रायोगिक ‘ऑप्टिकल सुदूर संवेदन उपग्रह’ (optical remote sensing satellite) है। 
  • माइक्रोसैट शृंखला का यह उपग्रह उच्च स्थानिक विभेदन के साथ अवरक्त बैण्ड (infra-red band) में उन्नत प्रकाशिक सुदूर संवेदन प्रचालन उपलब्ध कराने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • EOS-02 का वजन लगभग 145 किग्रा. है।
  • यह नई तकनीकों द्वारा कृषि‚ वानिकी‚ भू-विज्ञान एवं जल विज्ञान के क्षेत्रों में विभिन्न अनुप्रयोगों में सहयोग हेतु लक्षित था।

आजादीसैट

  • आजादीसैट एक 8U क्यूबसैट (Cubesat) है‚ जिसका भार लगभग 8 किग्रा. है।
  • भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अवसर पर स्पेस किड्‌ज इण्डिया नामक स्टार्टअप ने इस नैनो उपग्रह के निर्माण की पहल की है।
  • इसके अंगर्तत 75 अलग-अलग नीतभार शामिल हैं‚ जिनमें प्रत्येक का भार लगभग 50 ग्राम है और यह फेमटो-परीक्षण (Femto-experiments) संचालित करने के लिए लक्षित था।
  • इन नीतभारों का निर्माण करने के लिए देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों की छात्राओं को मार्गदर्शन प्रदान किया गया।
  • इन नीतभारों को ‘स्पेस किड्‌ज इण्डिया’ की छात्र टीम द्वारा एकीकृत किया गया है।

निष्कर्ष
SSLV कम लागत का प्रक्षेपण यान है‚ जो उपग्रह ऑपरेटरों को कक्षा एवं शेड्‌यूल के संदर्भ में‚ एक बार में कई उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की सुविधा प्रदान करेगा। वे जरूरत के अनुसार‚ कभी भी‚ कहीं भी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं; क्योंकि इस यान को प्रक्षेपण के लिए मात्र एक न्यूनतम बुनियादी ढांचे की ही आवश्यकता होती है। इसे बहुत कम समय में ही प्रक्षेपण के लिए तैयार किया जा सकता है।
    SSLV को इसरो के अगले वर्क हॉर्स रॉकेट के रूप में देखा जा रहा है। यह भविष्य में वाणिज्यिक लघु उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं में एक प्रमुख भूमिका निभाएगा।
     यह प्रथम अवसर नहीं था‚ जब इसरो को अपने किसी प्रक्षेपण यान के प्रथम मिशन में असफलता का सामना करना पड़ा। उल्लेखनीय है‚ कि 20 सितंबर‚ 1993 को ISRO के सबसे विश्वसनीय रॉकेटों में से एक PSLV की प्रथम विकासात्मक उड़ान भी विफल साबित हुई थी। लेकिन अक्टूबर‚ 1994 में अपनी प्रथम सफल उड़ान के पश्चात PSLV ने मुड़कर नहीं देखा और ये भारत के सर्वाधिक विश्वसनीय एवं बहु-उपयोगी रॉकेट के रूप में उभरकर सामने आया है। SSLV से भी इसी तरह की सफलता की उम्मीद है।

संकलन-सौरभ मेहरोत्रा

 


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