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Post at: Aug 26 2022

मिथिला मखाना

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • 6 अगस्त, 2022 को बिहार के मिथिला मखाना (Mithila Makhana) को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया।

पृष्ठभूमि

  • सितंबर‚ 2020 में सबौर (Sabour) स्थित कृषि विश्वविद्यालय ने मिथिलांचल मखाना  उत्पादक संघ की ओर से बिहार मखाना का नाम मिथिला मखाना करने के लिए जीआई रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर आवेदन किया था।
  • गौरतलब है, कि दिसंबर, 2021 में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री (Geographical Indications Registry: GIR) ने ‘बिहार मखाना’ का नाम बदलकर ‘मिथिला मखाना’ करने के आवेदन को स्वीकृति प्रदान की थी।
    • साथ ही इसकी पहचान और सुरक्षा के अलावा उत्पत्ति को बेहतर ढंग से दर्शाने हेतु संशोधित ब्राण्ड लोगो (Brand Logo) को भी स्वीकृत किया था।

मखाना

  • मखाना एक प्रकार का बीज है‚ जिसका वानस्पतिक नाम यूरियाले फेरॉक्स (Euryale Ferox) है।
  • कभी-कभी इसे फॉक्स नट (Fox Nuts) या कमल के बीज (Lotus seeds) के रूप में भी जाना जाता है।

महत्व

  • पोषक तत्वों से भरपूर।
  • उच्‍च प्रतिऑक्सीकारक।
  • रक्त शर्करा को स्थिर करने में मददगार।
  • विभिन्‍न इलाजों में दवा (पारंपरिक रूप) के रूप में उपयोगी।

उत्पादन

  • मखाना की उत्पत्ति का मूल स्थान दक्षिण-पूर्व एवं पूर्वी एशिया माना जाता है। 
  • हालांकि जापान‚ कोरिया‚ बांग्लादेश‚ चीन एवं रूस में यह जंगली पौधे के रूप में पाया जाता है।]
  • मुख्यत: यह उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उत्पादित होता है।
  • भारत में इसकी खेती बिहार‚ पश्चिम बंगाल‚ मणिपुर‚ त्रिपुरा‚ असम‚ जम्मू  और कश्मीर‚ ओडिशा‚ राजस्थान‚ मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में है।
  • बिहार, देश के कुल मखाना उत्पादन में लगभग 80-85 प्रतिशत तक योगदान करता है।
  • बिहार के प्रमुख मखाना उत्पादक जिले दरभंगा‚ मधुबनी‚ सीतामढ़ी‚ सहरसा‚ सुपौल‚ अररिया‚ पूर्णिया‚ किशनगंज एवं कटिहार हैं। 

 

क्या है भौगोलिक संकेतक?

  • भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication:GI) मुख्य रूप से किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्‍न कृषि‚ प्राकृतिक या निर्मित उत्पाद (हस्तशिल्प एवं औद्योगिक वस्तु) होता है। 
  • प्राय: इस तरह का नाम गुणवत्ता और विशिष्टता का आश्वासन देता है‚ जो निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में उसके मूल तथ्य के कारण होता है।
  • भौगोलिक संकेतक दो प्रकार के होतें हैं-
    • पहले प्रकार में वे भौगोलिक नाम हैं‚ जो उत्पाद के उद्‌भव के स्थान का नाम बताते हैं; जैसे शैंपेन (एक विशेष प्रकार की मदिरा‚जो वास्तव में फ्रांस के एक प्रांत का नाम है और इसे यहीं उगने वाले अंगूरों से बनाया जाता है)  एवं दार्जिलिंग चाय।
    • दूसरे प्रकार में गैर-भौगोलिक पारंपरिक नाम हैं‚ जो यह बताते हैं‚ कि उत्पाद किसी एक क्षेत्र  विशेष से संबद्ध है; जैसे-अल्फांसो आम एवं बासमती चावल।
  • किसी जीआई (GI) का पंजीकरण इसके पंजीकृत स्वामी और अधिकृत प्रयोगकर्ता को जीआई के प्रयोग का कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
  • गैर-अधिकृत व्यक्ति इसका प्रयोग नहीं कर सकता।
  • औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण हेतु पेरिस सम्मेलन के अनुच्छेद 1(2) और 10 के अंतर्गत भौगोलिक संकेतकों को बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights: IPR) के एक तत्व के रूप में शामिल किया गया है।
  • इन्हें बौद्धिक संपदा अधिकारों‚ करार के व्यापार संबंधी पहलुओं के अनुच्छेद 22 से 24 के अंतर्गत शामिल किया गया है‚ जो ‘गैट’ (General Agreement on Tariffs and Trade: GATT) के उरुग्वे चरण के समापन का हिस्सा थे।
  • भारत में जीआई भौगोलिक वस्तु संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम‚ 1999 के अनुसार जारी किए जाते हैं।
  • यह संकेतक ‘भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री’ द्वारा जारी किया जाता है‚ जो कि उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग‚ वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय‚ भारत सरकार के अंतर्गत आता है।

संकलन-आदित्य भारद्वाज
 


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