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16वां राष्ट्रपति चुनाव : समग्र विश्लेषण

परिचय

  • भारतीय लोकतांत्रिक ताने-बाने में राष्ट्रपति पद की अपनी एक गरिमा है।
  • यह पद हमारे लोकतंत्र और गणतंत्र का शीर्ष संवैधानिक पद है। 
  • राष्ट्रपति चुनाव भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा पर्व है, जिसमें आम जनमानस की प्रत्यक्ष भागीदारी न होते हुए भी सभ्ज्ञी की उत्सुकता बनी रहती है।
  • इस उत्सुकता का कारण राष्ट्र के मुखिया (राष्ट्राध्यक्ष) को चुना जाना है।
  • राष्ट्रपति का पद देश की एकता का भी प्रतीक है। 
  • राष्ट्रपति का पद देश की एकता का भी प्रतीक है। 
  • यह एक मात्र ऐसा पद है जिसका निर्वाचक मंडल इतना विशाल है कि अप्रत्यक्ष रूप से ही सही पूरा देश इस से जुड़ा होता है।
  • संविधान के अनुच्‍छेद 62 में प्रावधान है कि पदासीन राष्ट्रपति का कार्य काल समाप्त होने से पहले ही नए राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए।
  • यदि किसी असाधारण स्थिति में निर्वाचन समय से न हो पाए अथवा नवनिर्वाचित राष्ट्रपति किंही कारणों से यथासंभव पर ग्रहण न कर पाए, तो संविधान का अनुच्‍छेद 56 (ग) प्रभावी होगा।
  • अनुच्‍छेद 56 (ग) के अनुसार, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी राष्ट्रपति तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है।
  • संविधान द्वारा प्राप्त इन्हीं व्यवस्थाओं के तहत जुलाई 2022 में 16वां राष्ट्रपति चुनाव संपन्न हुआ।

 

16वां राष्ट्रपति चुनाव

  • भारत के 15वें राष्ट्रपति के निर्वाचन हेतु 16वें राष्ट्रपतीय चुनाव संबंधी अधिसूचना 15 जून, 2022 को जारी की गई थी।
  • नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 29 जून, नामांकन-पत्रों के जांच की तिथि 30 जून, अभ्यर्थिता वापस लेने की अंतिम तिथि 2 जुलाई तथा मतदान की तिथि 18 जुलाई एवं मतगणना की तिथि 21 जुलाई, 2022 रही।
  • निर्वाचन आयोग द्वारा 16वें राष्ट्रपतीय चुनाव के लिए राज्य सभा के महासचिव पीसी मोदी को निर्वाचन अधिकारी (Returning Officer) नियुक्त किया गया था।
  • 16वें राष्ट्रपतीय चुनाव में उम्मीदवारों द्वारा अभ्यर्थिता वापस लेने की अंतिम तिथि के बाद दो वैध प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में थे-
  1. झारखण्ड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू 
  2. पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्‍हा।
  • ध्यातव्य है, कि द्रौपदी मुर्मू सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की अधिकृत उम्मीदवार रहीं, जबकि यशवंत सिन्‍हा विपक्षी दलों (United Opposition) द्वारा समर्थित उम्मीदवार थे।
  • 18 जुलाई, 2022 को हुए मतदान में अर्हक कुल 4796 मतदाताओं (771 सांसद एवं 4025 विधायक) में से 99 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।
  • सांसदों के लिए हरे रंग के मत-पत्र तथा विधायकों के लिए गुलाबी रंग के के मत-पत्र की व्यवस्था की गई थी।
  • चार दौर के मतदान के उपरांत द्रौपदी मुर्मू को 6,76,803 मूल्य के 2824 वोट प्राप्त हुए। 
  • जबकि, यशवंत सिन्‍हा को 1877 वोट प्राप्त हुए, जिनका मूल्य 3,80,177 था।
  • कुल 53 मत अवैध (Invalid) घोषित किए गए।
  • द्रौपदी मुर्मू को कुल वैध मतों का 64.03 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ।
  • इस प्रकार द्रौपदी मुर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति निर्वाचित हुईं।
  • 25 जुलाई, 2022 को सर्वोच्‍च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन.वी.रमना ने द्रौपदी मुर्मू को भारत के नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई।

राष्ट्रपतीय चुनाव संवैधानिक व्यवस्था

  • भारतीय राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली का एक आदर्श नमूना है। 
  • जब संविधान सभा के समक्ष राष्ट्रपति के चुनाव का प्रश्न आया‚ तो एक सुझाव था कि केवल संसद के दोनों सदनों के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करें‚ परंतु ऐसा राष्ट्रपति संघ के संघटक राज्यों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करता। 
  • साथ ही भारत में संघीय व्यवस्था अपनाए जाने और तदनुसार‚ संघ एवं राज्यों का सह-अस्तित्व स्वीकार किए जाने के कारण राष्ट्रपति के निर्वाचन में संघ एवं राज्यों का समानुपातिक प्रतिनिधित्व आवश्यक माना गया। 
  • एक दूसरा सुझाव यह भी था कि राष्ट्रपति का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर आम जनता द्वारा हो।
  • परंतु‚ ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद का प्रतिद्वंद्वी शक्ति-केंद्र बन सकता था जो कि संसदीय उत्तरदायित्व प्रणाली के प्रतिकूल होता।
  • पं. नेहरू ने संविधान सभा में इस संदर्भ में कहा था ‘‘न तो हमारे राष्ट्रपति का प्रत्यक्ष निर्वाचन हो सकता है और न ही हम उसे ‘वास्तविक शक्तियां’ दे सकते हैं।’’
  • तदनुसार‚ संविधान के अनु. 54 के तहत राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचक मण्डल (Electoral College) के सदस्य करते हैं‚ जिसमें 
  • (a) संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और (b) राज्यों की विधान सभाओं (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली और पुदुचेरी की विधान सभाओं सहित-सत्तरवें संविधान संशोधन‚ 1992 से 1 जून‚ 1995 से लागू) के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। 
  • लोक सभा‚ राज्य सभा एवं राज्यों की विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव के निर्वाचक मंडल में शामिल नहीं होते हैं।
  • संविधान के अनु. 55 में राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति दी गई है।
  • अनु. 55 (1) के अनुसार‚ जहां तक साध्य हो‚ राष्ट्रपति के निर्वाचन में भिन्न-भिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में एकरूपता होगी।
  • अनु. 55 (2) के तहत राज्यों में आपस में ऐसी एकरूपता तथा समस्त राज्यों और संघ में समतुल्यता प्राप्त कराने के लिए संसद और प्रत्येक राज्य की विधान सभा का प्रत्येक निर्वाचित सदस्य ऐसे निर्वाचन में जितने मत देने का हकदार है‚ उसकी संख्या (अर्थात किसी सदस्य के एक मत का मूल्य कितना होगा) निम्नलिखित प्रकार से अवधारित की जाएगी-

 

a. किसी राज्य की विधान सभा के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के उतने मत होंगे जितने कि एक हजार के गुणित उस भागफल में हों‚ जो राज्य की जनसंख्या को उस विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर आए।
b. यदि एक हजार के उक्त गुणितों को लेने के बाद शेष पांच सौ से कम नहीं है‚ तो उक्त प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़ दिया जाएगा।
c. संसद के प्रत्येक सदन के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के मतों की संख्या वह होगी‚ जो उपर्युक्त प्रक्रिया के तहत सभी राज्यों (दिल्‍ली एवं पुदुचेरी सहित) की विधान सभाओं के सभी निर्वाचित सदस्यों के लिए नियत कुल मतों की संख्या को‚ संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर आए‚ जिसमें आधे से अधिक भिन्न को एक गिना जाएगा तथा अन्य भिन्नों की उपेक्षा की जाएगी-

 

  • 84वें संविधान संशोधन‚ 2001 से यह प्रावधान किया गया है कि जब तक वर्ष 2026 के बाद की प्रथम जनगणना के सुसंगत आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते तब तक राष्ट्रपतीय चुनाव के लिए अनु. 55 के तहत मतों के मूल्य की गणना के लिए ‘जनसंख्या’ से वर्ष 1971 की जनगणना के आंकड़े अभिप्रेत हैं।
  • वस्तुत: संविधान में विहित राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति का उद्देश्य है कि संघीय विधायिका अर्थात संसद के दोनों सदनों के मतों का मूल्य राज्यों की विधान सभाओं के मतों के मूल्य के समतुल्य हो और इस प्रकार राष्ट्रपति के निर्वाचन में संघ एवं राज्यों का समान प्रतिनिधित्व हो।
  • विधान सभाओं के सदस्यों के मतों का मूल्य संबंधित राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करता है अर्थात प्रत्येक सदस्य कितनी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
  • इसे निम्नलिखित उदाहरण से समझा जा सकता है—

आंध्र प्रदेश की कुल जनसंख्या (1971 जनगणना) : 27,800,586

राज्य विधान सभा में निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या : 175

प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य 

=27,800/1000 x 175

=159

  • अनु. 55 (2) के प्रावधानों के अनुसार‚ 14वें राष्ट्रपतीय चुनावों के लिए सभी राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों तथा संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के मतों का मूल्य अग्रलिखित सारणी में प्रस्तुत किया गया है-
  • संविधान के अनु. 55(3) के तहत राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार‚ एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा होता है और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होता है। 
  • राष्ट्रपति के निर्वाचन में मतदान की गोपनीयता अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके निर्वाचक मंडल के सदस्य अपने दलों के निर्देशों से बंधे नहीं होते तथा प्रत्येक सदस्य बगैर किसी दबाव के जिसे चाहे उसे अपना मत देने के लिए स्वतंत्र होता है अथवा वह चाहे तो मतदान से स्वयं को पृथक भी रख सकता है। 
  • वस्तुत: आईपीसी की धारा 171A(b), जिसमें चुनावों में मतदाता का ‘निर्वाचक अधिकार’ वर्णित है‚ इस संदर्भ में भी लागू होती है। 
  • संविधान के किसी भी अनुच्छेद और किसी भी विधि में यह नहीं कहा गया है कि राष्ट्रपति के निर्वाचन में मतदान दलीय आधार पर होगा या दलों के सदस्य दल सचेतक (Whip) से बाध्य होंगे। 
  • वस्तुत: गोपनीय मतदान की स्थिति में दल सचेतक का कोई अर्थ नहीं है‚ क्योंकि न तो उसकी अवहेलना का पता लगाया जा सकता है और न ही उसके लिए किसी सजा का प्रावधान है। 
  • राष्ट्रपति के निर्वाचन के संदर्भ में संविधान की 10वीं अनुसूची का दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होता है। 
  • सर्वोच्‍च न्यायालय ने राज्य सभा चुनावों के संदर्भ में पशुपति नाथ बनाम नेमिचंद्र जैन (AIR 1984 SC 399) और कुलदीप नैय्यर बनाम भारत संघ (AIR 2006 SC 3127) के मामलों में यह निर्धारित किया है कि राज्य विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा राज्य सभा चुनावों में मतदान गैर-विधायी कार्य है तथा इसे सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं माना जा सकता और तदनुसार‚ 10वीं अनुसूची के प्रावधान इस पर लागू नहीं होते। 
  • निर्वाचन आयोग द्वारा इसी आधार पर राष्ट्रपतीय चुनाव में भी निर्वाचक मंडल के सदस्यों के मतदान को सदन की कार्यवाही से पृथक मानते हुए 10वीं अनुसूची के दायरे से बाहर माना गया है। 
  • साथ ही निर्वाचन आयोग ने यह भी निर्धारित किया है कि राजनीतिक दल यद्यपि राष्ट्रपति पद के किसी प्रत्याशी को मत देने या न देने के लिए निर्वाचक मंडल के सदस्यों से अपील या अनुरोध कर सकते हैं‚
  • परंतु वे इस संदर्भ में दल सचेतक या निर्देश जारी नहीं कर सकते‚ क्योंकि यह आईपीसी की धारा 171C के तहत अनुचित रूप से मतदाताओं को प्रभावित करने के अपराध के तुल्य होगा। 
  • उल्‍लेखनीय है कि वर्ष 1969 में स्वयं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी श्री एन. संजीव रेड्डी के पक्ष में दल सचेतक जारी करने का विरोध किया था तथा निर्वाचक मंडल के सदस्यों द्वारा स्वविवेक के आधार पर किए गए मतदान से ही निर्दलीय प्रत्याशी श्री वी.वी. गिरि राष्ट्रपति चुने गए थे।

संकलन-मनीष प्रियदर्शी
 


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