Contact Us - 9792276999 | 9838932888
Timing : 12:00 Noon to 20:00 PM (Mon to Fri)
Email - ssgcpl@gmail.com
|
|

Post at: Jul 16 2022

फिनलैण्ड एवं स्वीडन द्वारा नाटो की सदस्यता हेतु आवेदन

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • हाल ही में फिनलैण्ड एवं स्वीडन द्वारा नाटो की सदस्यता हेतु आवेदन किया गया। जिसकी, स्वीकृति के बाद यह नाटो के क्रमश: 31वें व 32वें सदस्य होंगे।

पृष्ठभूमि

  • रूस-यूक्रेन युद्ध से उपजी सुरक्षा चिंताओं के संदर्भ में इन देशों द्वारा यह निर्णय लिया गया। 
  • उल्‍लेखनीय है, कि द्वितीय विश्व युद्ध के काल से ही यह दोनों नॉर्डिक देश तटस्थता की नीति अपना रहे थे, जिसके निम्नलिखित कारण थे-

फिनलैण्ड

  • रूस से मित्रवत संबंध बनाए रखने की मजबूरी 
  • फिनलैण्ड द्वारा मार्शल प्‍लान, नाटो एवं वाॅरसा पैक्ट आदि से दूरी बनाई रखी गई। यद्यपि वर्ष 1995 में यह ई.यू.का हिस्सा बना। 
  • तटस्थता की इसी नीति को ‘फिनलैण्ड मॉडल’ या फिनलैण्डीकरण भी कहा जाता है।
  • जमानत किसी भी ऐसे सुरक्षा गठबंधन के विरुद्ध था।

स्वीडन

(i) द्वितीय विश्व युद्ध में हार से सबक सीखते हुए स्वीडन द्वारा खुद को किसी भी सैन्य गठबंधन से दूर रखा गया।
(ii) 1990 के दशक से ही स्वीडन नाटो के अंतरराष्ट्रीय अभियानों में सहयोगी रहा है। यद्यपि घरेलू राजनीतिक समर्थन के अभाव में यह पूर्णकालिक सदस्य नहीं बन सका।

  • फिनलैण्ड एवं स्वीडन की नाटो सदस्यता के निहितार्थ-

फिनलैण्ड एवं स्वीडन हेतु

  • सुरक्षा गारंटी- सदस्य बनने के बाद दोनों देश नाटो के अनुच्‍छेद-5 के अंतर्गत उपलब्ध सामूहिक सुरक्षा के अधिकारी बन जाएंगे, जो किसी भी तरह के रूसी आक्रमण के खतरे के विरुद्ध सुरक्षा की गारंटी होगी।
  • आर्थिक लाभ- सदस्यता के बाद दोनों देश नाटो के सैन्य संसाधनों का भी उपयोग कर सकेंगे। उदाहरण हेतु लड़ाकू विमान खरीदने के स्थान पर ‘नाटो प्‍लेन पूल’ का लाभ लेना।

​​​​​​​नाटो हेतु

  • नाटो को मजबूती : फिनलैण्ड के नाटो में आने से इसकी रूस से लगी सीमाएं लगभग दोगुनी हो जाएंगी, जो किसी संभावित युद्ध की स्थिति में नाटो को प्रत्याक्रमण (काउंटर अटैक) के अधिक विकल्प उपलब्ध कराएगा।
  • बाल्टिक सागर में बढ़त-फिनलैण्ड एवं स्वीडन के आने से नाटो बाल्टिक सागर मे अपनी कमजोर स्थिति को मजबूत कर सकेगा। साथ ही नाटो का ‘एचिलस हील’ (Achillus heal) कहे जाने वाले ‘सुवाल्की गैप’ की सुरक्षा को भी सुदृढ़ कर सकेगा।
  • यूरोप हेतु-नॉर्डिक क्षेत्र की संयुक्त सुरक्षा योजनाओं को मूर्त रूप देते हुए क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग को बढ़ाएगा। 
  • यूक्रेन युद्ध से उपजी चिंताओं के परिप्रेक्ष्य में यूरोप को सुरक्षा आश्वासन प्रदान करेगा।

भारत हेतु-

  • तटस्थता की नीति छोड़ने हेतु कूटनीतिक दबावों में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी।
  • क्षेत्र में किसी भी संघर्ष की स्थिति में भारत के आर्थिक व कूटनीतिक हित प्रभावित होंगे।

रूस हेतु-

  • नाटो की सेनाओं की उपस्थिति रूस की सीमाओं तक हो जाएगी।
  • रूस हेतु व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण अटलांटिक महासागर के लिए गेट-वे कहे जाने वाले बाल्‍टिक सागर को चारों तरफ से नाटो सहयोगियों द्वारा घेर लिया जाएगा।
  • रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर घरेलू दबाव बढ़ेगा।
  • रूस अब चीन पर अधिक-से-अधिक आश्रित होता जाएगा, जिससे भारत हेतु समस्याएं बढ़ेंगी।

विश्व हेतु-

  • विश्व फिर से सैन्य गठबंधनों के उस दौर की ओर बढ़ रहा है, जिसने दो विश्व युद्धों को जन्म दिया।
  • नए कोल्ड वॉर का प्रारंभ।

सदस्यता हेतु रूकावटें-

तुर्की का विरोध-

  • कुर्दिस्तान समर्थक समूहों के खिलाफ कार्यवाही न करने के कारण तुर्की इनकी सदस्यता के विरुद्ध था। यद्यपि स्पेन में हुए नाटो सम्मेलन में तीनों देशों के मध्य एक समझ विकसित हुई है।

घरेलू राजनीति

  • नाटो की सदस्यता हेतु-संबंधित देश की संसद से भी प्रस्ताव कराना पड़ता है। उल्‍लेखनीय है, कि स्वीडन के वामपंथी दल तटस्थता के पक्षपाती हैं, अत: इस संबंध में कठिनाई आ सकती है।

आगे की राह

  • फिनलैण्ड एवं स्वीडन के नाटो में शामिल होने से रूसी विस्तारवाद पर अंकुश लग सकेगा। यद्यपि इससे पुन: एक हथियारों की दौड़  शुरू हो सकती है। 
  • भारत को इस संदर्भ  में तटस्थता की नीति बनाए रखते हुए यथास्थिति का मूल्यांकन करते रहना चाहिए। ध्यातव्य है, कि भारत द्वारा क्‍वाड, एस.सी.ओ. एवं एक संभावित ग्‍लोबल नाटो-जैसे रणनीतिक संगठनों की सदस्यता का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से करना चाहिए।

संकलन-विकल्प सिंह
 


Comments
List view
Grid view

Current News List