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छत्तीसगढ़ : सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता

परिचय
सामुदायिक वन संसाधन अधिकार

  • सामुदायिक वन संसाधन अधिकार अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम‚ 2006 के तहत प्रदान किए जाते हैं।
  • इसके अंतर्गत ग्राम सभाओं को वन संसाधनों की रक्षा‚ पुनरुत्पादन (Re-production) या संरक्षण या प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान किया जाता है।
    • जिसे वे पारंपरिक रूप से स्थायी उपयोग के लिए संरक्षित करते रहे हैं।
  • यह समुदाय को स्वयं और दूसरों के द्वारा वन उपयोग के लिए नियम बनाने की अनुमति देता है।
  • साथ ही यह सामुदायिक अधिकारों के साथ सामुदायिक वन संसाधन अधिकार‚ जिसमें निस्तारण अधिकार और गैर-लकड़ी वन उत्पादों पर अधिकारों को शामिल किया जाता है‚ जो समुदाय की स्थायी आजीविका सुनिश्चित करते हैं।

सामुदायिक वन संसाधन क्या है?

  • कोई भी वन संसाधन‚ जिसे आदिवासी और अन्य वनवासी समुदाय आजीविका के लिए उपयोग करते हैं और निर्भर रहते हैं‚ सामुदायिक वन संसाधन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
    • प्रत्येक सामुदायिक वन संसाधन क्षेत्र में पहचान योग्य स्थलों के साथ एक प्रथागत सीमा होती है‚ जिसमें किसी भी श्रेणी के वन शामिल हो सकते हैं—

 

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • 25 मई‚ 2022 को छत्तीसगढ़ सरकार राष्ट्रीय उद्यान के भीतर एक गांव के सामुदायिक वन संसाधन (Community Forest Resource : CFR) अधिकारों को मान्यता देने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है।
    • यह मान्यता बस्तर जिले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर एक गांव गुड़ियापदार में रहने वाले आदिवासीय समुदाय के सामुदायिक वन अधिकारों को दी गई है।
  • ध्यातव्य है‚ कि कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान‚ ओडिशा में सिमलीपाल के बाद दूसरा राष्ट्रीय उद्यान है‚ जहां वन संसाधन अधिकारों को मान्यता दी गई है।
    • वर्ष 2016 में‚ ओडिशा सरकार ने सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान के अंदर सामुदायिक वन संसाधनों को पहली बार मान्यता दी थी।

सामुदायिक वन संसाधन (अधिकार) का महत्व

  • ’वन अधिकार अधिनियम (2006)’ 2008 में लागू किया गया था‚ जिसका उद्देश्य वनों पर उनके प्रथागत अधिकारों की कटौती के कारण वन आश्रित समुदायों के साथ मिले ’ऐतिहासिक अन्याय’ को पूर्ववत (Re-store) करना था।
  • यह महत्वपूर्ण है; क्योंकि यह समुदाय के वन संसाधनों के उपयोग‚ प्रबंधन और संरक्षण के अधिकार को मान्यता देता है और कानूनी रूप से वन भूमि को धारण करने के लिए‚ जिसे इन समुदायों ने खेती और निवास के लिए उपयोग किया है।
  • यह वनों की स्थिरता और जैव विविधता के संरक्षण में वनवासियों की अभिन्न भूमिका को रेखांकित करता है।
  • राष्ट्रीय उद्यानों‚ अभयारण्यों और बाघ अभयारण्यों जैसे संरक्षित वनों के अंदर इसका अधिक महत्व है; क्योंकि पारंपरिक निवासी तब अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके संरक्षित वनों के प्रबंधन का हिस्सा बन जाते हैं।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • 9 अगस्त‚ 2021 को छत्तीसगढ़ शहरी क्षेत्रों में सामुदायिक व्ान संसाधन अधिकारों को मान्यता देने वाला देश का पहला राज्य बन गया था।
    • राज्य सरकार द्वारा धमतरी जिले के निवासियों के अधिकारों को मान्यता दी गई है।

वन अधिकार अधिनियम‚ 2006

  • अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम‚ 2006 एक ऐतिहासिक कानून है।
  • यह भूमि‚ सामुदायिक वन संसाधनों और आवासों और वनों के शासन और प्रबंधन पर वनवासियों के अधिकारों को बहाल करता है।
  • अधिनियम पारंपरिक वनवासी समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान करता है‚ वन कानूनों के कारण होने वाले अन्याय को आंशिक रूप से सही करता है।
  • यह वन संरक्षण के लिए प्रतिबंधों के अधीन अवैध बेदखली या जबरन विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं के मामले में पुनर्वास के लिए प्रावधान करता है।
  • इसमें निवासियों के अधिकारों का विस्तार लघु वनोपज‚ चराई क्षेत्रों आदि को निकालने तक है।
  • जिला स्तरीय समिति के निर्णय अंतिम व बाध्यकारी माने जाते हैं। 
  • इन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया की निगरानी के लिए राज्य सरकार द्वारा एक राज्य स्तरीय निगरानी समिति का गठन किया जाता है। 

सिमलीपाल बायोस्फीयर रिजर्व

  • यह ओडिशा राज्य के मयूरभंज जिले में अवस्थित है।
  • सिमलीपाल का नाम ’सिमुल’ (रेशम कपास) पेड़ से लिया गया है।
  • वर्ष 1994 में भारत सरकार द्वारा इसे बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया था। 
  • वर्ष 2009 में इसे यूनेस्को (UNESCO) के विश्व नेटवर्क कार्यक्रम में शामिल किया गया। 

​​​​​​​कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान

  • इसका नाम बस्तर जिले में बहने वाली ’कांगेर नदी’ से लिया गया है।
  • यह छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में जगदलपुर के पास अवस्थित है।
  • वर्ष 1982 में कांगेर घाटी को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला।
  • यह छत्तीसगढ़ का राज्य पक्षी बस्तर की हिल मैना के पर्यावास के लिए भी प्रसिद्ध है। यह पक्षी मानव आवाज के अनुकरण में सक्षम है।

संकलन — पंकज तिवारी


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