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Post at: Jun 10 2022

चीन-ताइवान विवाद

परिचय

  • मई, 2022 में क्‍वाड शिखर सम्मेलन से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ताइवान के संदर्भ में चीन के विरूद्ध एक बयान दिया।
  • इस बयान में राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा कि यदि ‘चीन’ ताइवान में सैन्य हस्तक्षेप करता है, तो अमेरिका चीन के खिलाफ सैन्य कार्यवाही कर सकता है।
  • ध्यातव्य है, कि हाल ही में एक चीनी सैन्य अधिकारी का कथित ऑडियो टेप वायरल हुआ था, जिसमें चीन द्वारा ताइवान के खिलाफ युद्ध की बात कही गई थी।

चीन-ताइवान विवाद की पृष्ठभूमि

  • ताइवान का पूर्व नाम फाॅर्मोसा (Formosa) है। फाॅर्मोसा एक पुर्तगाली शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘खूबसूरत’।
  • ध्यातव्य है, कि ताइवान ‘ताइवान जलडमरूमध्य’ (Taiwan Straight) में अवस्थित एक द्वीप है, जो मुख्य भूमि चीन के तट पर अवस्थित है।
  • चीनी गृहयुद्ध (1945-49) के पश्चात चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इसमें विजयी रही।
  • तत्कालीन समय में सत्ता पर काबिज राष्ट्रवादी सरकार कुओमिंतांग (Kuomintang) ताइवान पलायन कर गई।
  • चीनी राष्ट्रवादी सरकार ‘कुओमिंतांग’ ने ताइवान में ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना की, जबकि चीन की मुख्य भूमि पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना की।

  • ताइवान की बागडोर च्‍यांग काई शेक (Chiang Kai-shek)  ने संभाली, जबकि चीनी मुख्य भूमि की बागडोर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ जेदांग (Mao Zedong)  ने संभाली। 
  • ध्यातव्य है, कि मुख्य भूमि चीन यानी ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ यानी ताइवान को एक विश्वासघाती प्रांत के रूप में देखता है।
  • ताइवान के वर्तमान स्वरूप की बात करें, तो चीन ‘वन चाइना पॉलिसी’ के तहत, ताइवान को मुख्य भूमि चीन का हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान स्वयं को स्वतंत्र देश के रूप में मान्‍यता देता है।

शीत युद्ध का दौर एवं चीन-ताइवान तनाव

  • ताइवान के अस्तित्व में आने के बाद से ताइवान को ही संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी सदस्यता (वर्ष 1971 तक) प्रदान की गई थी।
  • वर्ष 1971 में यह स्वीकार किया गया कि ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ ही स्थायी सदस्यता की असली हकदार है।
  • शीत युद्ध के दौर में ताइवान अमेरिकी समूह में, जबकि चीन सोवियत रूस वाले समूह में शामिल था। इस चीज ने दोनों के संबंधों को और भी बुरी स्थिति में पहुंचा दिया।

चीन-ताइवान तथा अमेरिका

  • अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी स्थिर नहीं होता,  सिवाय राष्ट्रहित के। राष्ट्रहितों के सामंजस्य ने चीन एवं अमेरिका को रणनीतिक संबंध कायम करने पर मजबूर कर दिया।
  • वर्ष 1972 में तत्‍कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ‘रिचर्ड निक्सन’ ने मुख्य भूमि चीन या PRC (People's Republic of China)  की यात्रा की।
  • इस यात्रा में अमेरिका ने चीन के ‘वन चाइना पॉलिसी’ को स्वीकार कर लिया एवं PRC  को ही संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता प्राप्त हुई।

वन चाइना पॉलिसी क्‍या है ?

  • ‘वन चाइना पॉलिसी’ मुख्य भूमि चीन यानी 'PRC' की एक नीति है, जो विशेषकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में इस्तेमाल की जाती है।
  • इस नीति के तहत, PRC यह मानता है, कि जिस भी देश को PRC के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करना है, उन्हें चीन के रूप में ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ यानी मुख्य भूमि चीन को मान्यता देनी होगी।

भारत का चीन-ताइवान के संदर्भ में दृष्टिकोण

  • भारत के संदर्भ में बात करें, तो भारत वर्ष 1949 से ही ‘वन चाइना पॉलिसी’ को स्वीकार करता है एवं मुख्य भूमि चीन (Main land China) को ही चीन का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है। 
  • ध्यातव्य है, कि भारत एवं ताइवान के बीच कोई आधिकारिक संबंध नहीं है । तथापि जब भारत सरकार ने वर्ष 1991 में लुक ईस्ट पॉलिसी शुरू की तो, दोनों के बीच संपर्क में तेजी आई।
  • वर्ष 1995 में दोनों देशों ने एक-दूसरे की राजधानियों में प्रतिनिधि कार्यालय स्थापित किए।
  • साथ ही साथ व्यापार एवं नागरिक-नागरिक संपर्क में वृद्धि हुई है।

​​​​​​​ संकलन-अलोक त्रिपाठी


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