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आई.पी.सी.सी. की छठवीं आकलन रिपोर्ट : जलवायु परिवर्तन का शमन

IPCC क्‍या है ?

  • जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) का गठन वर्ष 1988 में किया गया था।
    •  इसका ‘गठन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (UNEP) तथा ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (WMO)  द्वारा किया गया था।
  • IPCC  की स्थापना सरकारों को सभी स्तरों पर वैज्ञानिक सूचना प्रदान करना, जिसका उपयोग वे अपनी जलवायु नीतियों को विकसित करने के लिए कर सकें।
    •  IPCC  की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन वार्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण आगत प्रदान करता है।
  • IPCC विश्व के विभिन्‍न देशों के सरकारों का एक संगठन है, जो संयुक्त राष्ट्र का विश्व मौसम विज्ञान संगठन के सदस्य हैं। 
  • वर्तमान समय में IPCC के 195 सदस्य हैं।
  • विश्व के विभिन्‍न क्षेत्रों के लोग स्वैच्‍छिक तौर पर (IPCC) की कार्यप्रणाली में योगदान देते हैं। 
    • IPCC अपने स्तर पर कोई अनुसंधान का कार्य नहीं करता और न ही जलवायु परिवर्तन संबंधी आंकड़ों की निगरानी करता है।

  • राष्ट्रीय ग्रीन हाउस गैस सूची पर कार्य बल का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन और निष्कासन की गणना और रिपोर्टिंग के लिए एक पद्धति को विकसित और परिष्कृत करना है।
  • IPCC पैनल तीन कार्य समूह और कार्य बल के अतिरिक्त किसी विशिष्ट विषय या प्रश्न पर विचार करने के लिए निर्धारित समयावधि के लिए अन्य कार्य समूहों की भी स्थापना कर सकता है।
  • IPCC जलवायु परिवर्तन, इसके कारणों, संभावित प्रभावों इत्यादि के बारे में व्यापक आकलन रिपोर्ट तैयार करता है।
    •  अप्रैल, 2022 तक IPCC 6 आकलन रिपोर्ट, क्रमश: 1990, 1995, 2001, 2007, 2013-14 और 2021-22 में जारी कर चुका है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • 4 अप्रैल, 2022 को IPCC के कार्य समूह 3 ने छठवीं आकलन रिपोर्ट के क्रम में तीसरी रिपोर्ट ‘जलवायु परिवर्तन, 2022 :  जलवायु परिवर्तन का शमन’ नाम से जारी की।
    •  गौरतलब है, कि इससे पूर्व कार्य समूह- 1 ने 9 अगस्त, 2021 को ‘जलवायु परिवर्तन, 2021 : भौतिक विज्ञान आधार’ शीर्षक से पहली रिपोर्ट जारी की थी।
  • कार्य समूह-2 ने 28 फरवरी, 2022 को जलवायु परिवर्तन, 2022 : प्रभाव अनुकूलन और सुभेद्‍ता’ शीर्षक से अपनी दूसरी रिपोर्ट जारी की थी।
  •  IPCC के आकलन रिपोर्ट की श्रृंखला की अंतिम कड़ी सिंथेसिस रिपोर्ट है, जिसकाप्रकाशन सितंबर, 2022 में होने की संभावना है।

IPCC कार्य समूह-3 :  रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु :

  • 010-2019 के दौरान औसत वार्षिक वैश्विक ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन पिछले किसी भी दशक की तुलना में अधिक था, लेकिन 2010 और 2019 के बीच की वृद्धि दर 2000 और 2009 के बीच की वृद्धि दर की तुलना में  कम थी 
  • पूर्व-औद्योगिक युग में (19वीं शताब्दी के मध्य में) औसत तापमान की तुलना में दुनिया को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होने तक सीमित रखने हेतु ग्रीन हाउस गैस में तत्काल और अत्यधिक कमी करनी होगी।
  • रिपोर्ट के मुताबिक, 1850-2019 के बीच दुनिया ने 2400 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन किया। इस उत्सर्जन का 42 प्रतिशत पिछले 30 वर्षों में और 17 प्रतिशत पिछले 10 वर्षों में हुआ, जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में खतरनाक वृद्धि की ओर संकेत करता है।
    •  पृथ्वी के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दुनिया केवल 500 अरब टन उत्सर्जन और अधिक कर सकती है।
  • रिपोर्ट में कार्बन उत्सर्जन का शमन करने हेतु निम्नलिखित उपायों को सुझाया गया है : नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, जलवायु अनुकूल भवन तथा जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियां।
  • रिपोर्ट में दुनिया में असमानता पर भी प्रकाश डाला गया है। 
  • रिपोर्ट के मुताबिक, 35 प्रतिशत लोग उन देशों में रहते हैं, जिनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 9 टन CO2 के बराबर है, जबकि 41 प्रतिशत उन देशों में रहते हैं, जहां उत्सर्जन 3 टन से कम है। 
  • इसका अर्थ है, कि अधिक उत्सर्जन का सबसे बुरा प्रभाव गरीबों द्वारा महसूस किया जाता है।
  • ध्यातव्य है, कि भारत का प्रति व्यक्‍ति उत्सर्जन 1.8 टन है।
  • वर्ष 2019 तक, निरपेक्ष उत्सर्जन में सबसे बड़ी वृद्धि जीवाश्म ईंधन  और उद्योग जनित कार्बन डाइऑक्साइड में हुई, जबकि मीथेन का स्थान इसके बाद रहा।

रिपोर्ट का भारत के लिए निहितार्थ

  • रिपोर्ट नए कोयला संयंत्र खोलने के खिलाफ चेतावनी देता है, जो भारत के लिए प्रासंगिक है। 
  • पैनल ने पाया कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है, तो कोयले से संचालित होने वाले वे सभी बिजली संयंत्र, जो सी.सी.एस. (CCS-Capture and Store Carbon)  तकनीक के बिना संचालित हो रहे हैं, उन्हें वर्ष 2050 तक बंद करना होगा।
  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के मुताबिक, भारत में लगभग 211 गीगावाॅट के कोयले से संचालित होने वाले बिजली संयंत्र हैं, जो वैश्विक क्षमता का लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त 31 गीगावॉट का निर्माण किया गया था तथा 24 गीगावॉट पूर्व निर्माण के विभिन्‍न चरणों में हैं।
    •  ध्यातव्य है, कि भारत में निर्माणाधीन कोयले से संचालित बिजली संयंत्रों मंे से किसी में भी सी.सी.एस. (CCS) सुविधा नहीं है।
  • भारत ने वर्ष 2070 तक कार्बन डॉइऑक्साइड उत्सर्जन को शून्य तक करने का लक्ष्य रखा है तथा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर गमन की दिशा में संक्रमण अवधि के लिए अपने मार्ग को परिभाषित किया है। लेकिन, अपने विकास की जरूरतों को देखते हुए भारत कोयले का उपयोग करने के अधिकार पर भी जोर देता है।
    •  भारत इस बात पर बल देता है, कि जीवाश्म ईंधन जनित जलवायु परिवर्तन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी विकसित देशों की है। अत :  उन्हें कार्बन उत्सर्जन में अधिक कटौती करनी चाहिए।

निष्कर्ष

  • अंतत: यह कहना उचित होगा कि नीतियों को निर्धारित करना और सरकारों को यह बताना कि उन्हें क्या करना चाहिए, यह IPCC  के दायरे में नहीं है। IPCC का काम सूचना इकट्ठा करना और शोध करने के साथ ही समाप्त हो जाता है। अब यह विभिन्‍न सरकारों के तहत कार्यरत नीति-निर्माताओं पर निर्भर करता है, कि वे IPCC की रिपोर्टों पर कार्यवाही करें। जलवायु परिवर्तन पर ठोस कदम उठाने हेतु इस बात पर गहन वार्ता होना चाहिए तथा सभी का उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो इसका भुगतान भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को करना पड़ेगा।

​​​​​​​संकलन-वृषकेतु रॉय


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