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Post at: Apr 29 2022

भारत की आर्कटिक नीति

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • 17 मार्च, 2022 को (मार्च, 2022), पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा भारत की आर्कटिक नीति जारी की गई है।
    • आर्कटिक नीति का शीर्षक- ‘‘भारत और आर्कटिक : सतत विकास के लिए साझेदारी का निर्माण’’ (India and the Arctic : Building a Partnership for Sustainable Development)।
  • उद्देश्य :  संसाधन संपन्‍न और तेजी से बदलते आर्कटिक क्षेत्र के साथ भारत के सहयोग को बढ़ाना।
  • भारत की आर्कटिक नीति के छह स्तंभ हैं, जो निम्नवत हैं:

(1) प्रथम स्तंभ : वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सहयोग-निम्नलिखित के माध्यम से भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सहयोग को मजबूत करना-
(i) हिमाद्री में मौजूद अनुसंधान केंद्र को मजबूत बनाना।
(ii)  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्कटिक क्षेत्र की प्राथमिकताओं के अनुरूप अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।
(iii)  जियो इंजीनियरिंग , कोल्ड बायोलॉजी और माइक्रोबियल डाइवर्सिटी जैसे विषयों में मौजूदा विशेषज्ञता को दिशा देना और उनका इस्तेमाल करना।
(2) द्वितीय स्तंभ :  जलवायु एवं पर्यावरण संरक्षण -
    निम्नलिखित के माध्यम से जलवायु एवं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में योगदान देना-
(i)  मौसम और जलवायु संबंधी पूर्वानुमानों में मदद करने तथा अर्थ सिस्टम मॉडलिंग को बेहतर बनाने के लिए भागीदारों के साथ जुड़ना। 
(ii) आर्कटिक क्षेत्र में पर्यावरण संबंधी प्रबंधन में योगदान करना।
(iii)  आर्कटिक -मीथेन उत्सर्जन से निपटने के लिए पर्यावरण संबंधी प्रबंधन में योगदान देना।
(3)  तृतीय स्तंभ :  आर्थिक और मानव विकास -

  • आर्थिक एवं मानव विकास हेतु निम्नलिखित दिशा में कार्य करना -

(i) प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों के अन्‍वेषण के अवसरों की तलाश करना।
(ii)  आर्कटिक क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में निवेश के अवसरों की पहचान करना।
(4) चतुर्थ स्तंभ :  परिवहन और कनेक्टिविटी -

  • परिवहन और कनेक्टिविटी को निम्नलिखित के माध्यम से बढ़ावा देना -

(i) प्रासंगिक विशेषज्ञता रखने वाले भागीदारों के साथ पोत निर्माण के क्षेत्र में सहयोग करना।
(ii) आर्कटिक  क्षेत्र से आवागमन में लगे पोतों के लिए चालक दल के रूप में भारतीय नाविकों हेतु अवसरों को बढ़ावा देना।
(5) पंचम स्तंभ: गवर्नेंस और अंतरराष्ट्रीय सहयोग -

  • गवर्नेंस (शासन) एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बेहतर करने के लिए निम्न पर बल देना -

(i)  आर्कटिक क्षेत्र की जटिल गवर्नेंस व्यवस्था के संबंध में समझ को बेहतर बनाना।
(ii) आर्कटिक से संबंधित अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संधि फ्रेमवर्क में सक्रिय रूप से भाग लेना।
(6) षष्ठ स्तंभ : राष्ट्रीय क्षमता निर्माण -

  • राष्ट्रीय क्षमता निर्माण को मजबूत करने के लिए निम्नलिखित पर बल देना -

(i)  संस्थागत और मानव संसाधन क्षमता को मजबूत बनाना।
(ii)  आइस-क्‍लास स्टैण्डर्स वाले पोतों के निर्माण में स्वदेशी क्षमता  का निर्माण करना।
आर्कटिक का महत्व -
(i)  आर्कटिक क्षेत्र में परिवर्तन, विशेष रूप से आर्कटिक की हिम का पिघलना, राष्ट्रीय विकास के लिए अत्यधिक विघटनकारी साबित हो सकता है।
(ii)  ध्रुवीय क्षेत्र से जुड़े अध्ययन और हिमालयी क्षेत्र के बीच समन्वय आवश्यक है।
(iii) आर्कटिक क्षेत्र में हिम के पिघलने से ऊर्जा संसाधनों की खोज, खनन, पोत-परिवहन आदि जैसे अवसरों के नए द्वार खुलेंगे।
आर्कटिक परिषद

  • आर्कटिक परिषद की स्थापना वर्ष 1996 में ओटावा डिक्‍लेरेशन के माध्यम से की गई।
    • मुख्यालय :  ट्रोम्सो, नाॅर्वे
    • सदस्य (8) : रूस, स्वीडन, फिनलैण्ड, आइसलैण्ड, नाॅर्वे, डेनमार्क, कनाडा एवं अमेरिका (USA)  
    •  आर्कटिक परिषद में 13 गैर-आर्कटिक देशों को भी शामिल किया गया है।
    • आर्कटिक परिषद के 13 पर्यवेक्षक (Observer) देशों में भारत भी शामिल है।

संकलन-शिशिर अशोक सिंह


 


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