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नगालैण्ड, मणिपुर और असम के कुछ क्षेत्रों से ‘अफस्पा’ का निरसन

अफस्पा क्‍या है ?

  • 22 मई, 1958 को भारत के राष्ट्रपति ने ‘सशस्त्र बल विशेष अधिकार अध्यादेश’ को जारी कर उत्तर-पूर्व के राज्यों में हिंसा जनित अव्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए सशस्त्र बलों को सशक्त किया।
  • संसद के दोनों सदनों ने वर्ष 1958 में ‘द आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पॉवर्स) विधेयक को पारित किया, जो 11 सितंबर, 1958 को राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात अधिनियम बन गया।
  • द आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पॉवर्स) अधिनियम, 1958 [Armed Forces (Special Powers) Act (AFSPA),1958] को संक्षिप्त रूप में ‘अफस्पा कहते हैं।
  • अफस्पा अधिनियम को उत्तर-पूर्व के राज्यों, यथा अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड और त्रिपुरा में लागू किया गया।
  • अफस्पा अधिनियम की धारा 3 के तहत, केंद्र सरकार या राज्य का राज्यपाल या संघ शासित क्षेत्र का प्रशासक राज्य या संघ शासित क्षेत्र के संपूर्ण या कुछ क्षेत्रों को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकते हैं।
    •  इस आशय के लिए घोषित अशांत क्षेत्रों में 5 या इससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी होगी।
    • ऐसे क्षेत्रों में सशस्त्र बलों द्वारा बिना वारंट के किसी व्यक्ति को संदेह के आधार पर गिरफ्‍तार किया जा सकता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

  • 1 अप्रैल, 2022 से उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों नगालैण्ड,असम और मणिपुर के कुछ क्षेत्रों में प्रभावी अफस्पा को गृह मंत्रालय ने हटाने की घोषणा की।
    • 1 अप्रैल, 2022 से असम के 23 जिलों में पूर्णरूप से और 1 जिले में आंशिक रूप से अशांत क्षेत्र अधिसूचना को हटाया गया।
    • 1 अप्रैल, 2022 से नगालैण्ड के 7 जिलों के 15 पुलिस स्टेशनों से अशांत क्षेत्र अधिसूचना को हटाया गया।
  • 1अप्रैल,  2022 से मणिपुर के 6 जिलों के 15 पुलिस स्टेशन क्षेत्र को अशांत क्षेत्र अधिसूचना से बाहर किया गया।
  • सरकार द्वारा यह कदम उत्तर-पूर्वी राज्यों में विकास में तेजी और सुरक्षा स्थिति में उल्‍लेखनीय सुधार होने के मद्देनजर उठाया गया।
    • ध्यातव्य है, कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में वर्ष 2014 की तुलना में, वर्ष 2021 में उग्रवादी घटनाओं में 74 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
    • इस अवधि में सुरक्षा कर्मियों और नागरिकों की मृत्यु के मामलों में भी क्रमश: 60 प्रतिशत और 84 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
  • विगत कुछ वर्षों में लगभग 7000 उग्रवादियों ने सरेण्डर किया।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में शांति स्थापना हेतु सरकार के प्रयास

  • जनवरी, 2020 में बोडो समझौता के जरिए असम की 5 दशक पुरानी बोडो समस्या का समाधान।
  • 4 सितंबर, 2021 को संपन्‍न कार्बी-आंगलांग समझौता के जरिए असम के कार्बी क्षेत्र में विवाद का समाधान।
  • अगस्त, 2019 में ‘द नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एस.डी.)’ के साथ समझौता के जरिए त्रिपुरा में उग्रवादियों को समाज की मुख्य धारा में लाने का प्रयास।
  • 6 जनवरी, 2020 को ब्रू-रियांग शरणार्थी संकट को सुलझाने हेतु समझौता। इसके जरिए 37,000 आंतरिक विस्थापित लोगों को त्रिपुरा में बसाया गया।
  • 29 मार्च, 2022 को असम और मेघालय राज्य की सीमा के संदर्भ में समझौता।

उत्तर-पूर्व में अफस्पा कानून

  • असम में वर्ष 1990 से अफस्पा कानून के तहत अशांत क्षेत्र अधिसूचना लागू है।
  • नगालैण्ड में वर्ष 1995 से अशांत क्षेत्र अधिसूचना लागू है।
  • मणिपुर में इंफाल नगरपालिका क्षेत्र को छोड़कर वर्ष 2004 से अशांत क्षेत्र अधिसूचना लागू है।
  • ‘अफस्पा’ कानून के तहत, अशांत क्षेत्र अधिसूचना को त्रिपुरा से वर्ष 2015 में और मेघालय से वर्ष 2018 में पूरी तरह से हटा लिया गया।
  • वर्ष 2015 में अरुणाचल प्रदेश में अफस्पा के तहत अधिसूचित क्षेत्र में कमी लाते हुए इसे सिर्फ 3 जिलों में और 1 अन्य जिले के 2 पुलिस स्टेशनों तक सीमित किया गया।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • वर्ष 2004 में यू.पी.ए. सरकार द्वारा अफस्पा कानून की समीक्षा करने हेतु जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था, जिसने इसे निरसित करने का सुझाव दिया था।
  • मणिपुर में अफस्पा कानून को निरसित करने के लिए इरोम शर्मिला 16 वर्षों तक भूख हड़ताल पर रहीं।

अफस्पा के पक्ष में तर्क

  • सशस्त्र बलों के लिए उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से कार्य करने में सहायक।
  • इस अधिनियम के प्रावधानों ने अशांत क्षेत्रों में कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ ही राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • विद्रोही व उग्रवादी गतिविधियों के कारण सशस्त्र बल के सैकड़ों जवान प्रतिवर्ष अपनी जान गंवाते हैं। अत: उन्हें सशक्त बनाने में यह कानून सहायक है।

‘अफस्पा’ कानून के विपक्ष में तर्क

  • इस कानून के तहत, प्रदत शक्तियों का सशस्त्र बलों द्वारा दुरुपयोग कर फर्जी मुठभेड़ में निर्दोष लोगों को मारने और महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगता है।
  • कानून के तहत, प्रदत्त शक्तियों का दुरुपयोग मानवाधिकार का उल्‍लंघन तथा भारतीय लोकतंत्र में आम जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
  • यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकार एवं स्वतंत्रता को निलंबित करके भारतीय लोकतंत्र को कमजोर बनाता है।
  • यह कानून लगभग 50 वर्षों से अस्तित्व में होने के बावजूद अशांत क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करने के अपने उद्देश्य में विफल रहा है।

संकलन- वृषकेतु राय
 


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