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Post at: Oct 04 2021

पराग कैलेंडर

वर्तमान परिप्रेक्ष्य 

  • 6 सितंबर, 2021 को पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्‍यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च और पंजाब विश्वविद्यालय ने चंडीगढ़ के लिए एक पराग कैलेंडर विकसित किया।
  • यह भारत के किसी शहर के लिए अपनी तरह का प्रथम प्रयास है।
  • पराग कैलेंडर को लगभग दो वर्षों तक हवाई/वायुजनित पराग और इसके मौसमी बदलावों का अध्ययन करने के बाद बनाया गया है।

पराग कैलेंडर

  • पराग कैलेंडर एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में मौजूद हवाई/वायुजनित परागकणों की समय गतिशीलता का प्रतििनधित्‍व करते हैं।
  • वे एक चित्र में किसी विशिष्ट मौसम में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हुए, पूरे वर्ष के दौरान मौजूद विभिन्‍न वायुजन्‍य परागकणों के बारे में सुलभ दृश्य विवरण उपलब्ध कराते हैं।
  • पराग कैलेंडर स्थान विशिष्ट होते हैं और इनकी सांद्रता स्थानीय रूप से वितरित वनस्पतियों से निकटता से संबंधित होती है।
  • हालांकि यह अवधारणा नई नहीं है, यह प्रमुख पर्यावरणीय चिंताओं में से एक है।
  • भारतीय शहरों ने अभी तक इस समस्या/पर्यावरणीय िचंता की ओर ध्यान आकृष्ट नहीं किया था। चंडीगढ़ ने पहली बार इसकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है।
  • यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और यू.एस.ए. द्वारा राइनाइटिस/हे फीवर को रोकने तथा निदान करने के लिए पराग कैलेंडर का उपयोग किया जा रहा है।
  • ये देश पराग के, मौसम के समय का एवं इसकी गंभीरता का पता लागने के लिए क्षेत्रीय पराग कैलेंडर का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहें हैं।

आवश्यकता क्‍यों?

  • परागकण नर जैविक संरचनाएं होती हैं, जिनकी निषेचन में प्रमुख भूमिका होती है, किंतु श्वसन के समय शरीर के अंदर प्रवेश कर एलर्जी का कारण बनते हैं।
  • हवा में तैरने वाले परागकण श्वसन पथ संक्रमण एवं नासो-ब्रान्‍कियल एलर्जी का कारण बन सकते हैं।
  • ये अस्थमा, मौसमी राइनाइटिस और अन्‍य श्वसन संबंधी बीमारियों का कारण बन सकती हैं।
  • भारत में लगभग 20-30 प्रतिशत आबादी एलर्जिक राइनाइटिस/हे फीवर से पीड़ित है और लगभग 15 प्रतिशत लोगों को अस्थमा है।
  • पराग एक प्रमुख वाह्‍य वायुजन्‍य एलजैन है, जो एलर्जिक राइनाइटिस और त्‍वचा में खुजली और सूजन के लिए जिम्मेदार हैं।

पराग कैलेंडर का लाभ

  • संभावित संक्रमण खतरे की पहचान करने में मदद करेंगे।
  • परागकणों की उच्‍च सघनता के समय जोखिम को सीमित करने में सहायक होंगे।
  • नागरिकों के लिए प्राथमिक दिशा-निर्देश तैयार करने में मदद करेंगे।
  • परागकणों की उच्‍च सांद्रता के समय का पता लगाकर जागरूकता बढ़ाने में मदद करेंगे।

आगे की राह

  • अध्ययन बताते हैं कि भिन्‍न-भिन्‍न मौसम में भिन्‍न-भिन्‍न पराग पाए जाते हैं। यह परागकण की परिवर्तनशीलता की ओर इंगित करता है।
  • वसंत एवं शरद ऋतु में वायुजन्‍य परागकरण अत्‍यंत सक्रिय (क्रियाशील) होते हैं।
  • पराग कैलेंडर मौसम की समझ बढ़ाएंगे और परागकणों से होने वाले संक्रमण को कम करेंगे।

संकलन - अशोक कुमार ितवारी
 

 


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